विपक्ष के तरकश में बहुत तीर हैं अभी

* दोनों पक्षों में फिलहाल तो नीट पर ही चल रही है रस्साकसी * अग्निवीर, बेरोजगारी, संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दे तो अभी बाकी हैं * बढ़े संख्या बल का लाभ उठा कर सरकार को घेरने की हो रही है पूरी कोशिश * आने वाले समय में विपक्ष की यही ताकत रहेगी या नहीं, समय बताएगा

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लखनऊ/नयी दिल्ली। 2024 के चुनाव के बाद 18वीं लोकसभा में विपक्ष का संख्या बल बढ़ने से सदन का नजारा बदल गया है। विपक्ष अब हर बात पर सत्ता पक्ष को दबाव में लेने की पुरजोर कोशिश में है। हालांकि सरकारी पक्ष ने भी अपने इरादे साफ कर दिए हैं कि वह किसी दबाव में आने वाला नहीं। इस बार अभी तक एक बात यह भी दिख रही है कि दोनों ही पक्ष इंटैक्ट हैं, हर मुद्दे पर एक ही भाषा बोल रहे हैं। परंतु आगे भी यह एकता बनी रहेगी या नहीं, यह देखने वाली बात होगी। क्योंकि यूपी, बिहार और महाराष्ट्र से कुछ अलग किस्म की हवा आ रही है।

नयी लोकसभा में विपक्ष और सरकार एक-दूसरे को दबाव में लेने की पुरजोर कोशिश में हैं। विपक्ष ने जहां बढे संख्या बल के आधार पर सरकार को दबाव में लेने की कोशिश की है वहीं सत्ता पक्ष भी यह जताने में लगा हुआ है कि हम किसी दबाव में नहीं आने वाले। विपक्ष ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान ही अपने इरादे स्पष्ट कर दिए कि वह सरकार को चैन से नहीं बैठने देगा। वह ये दर्शाना चाहता है कि इस बार हम संख्या में अधिक हैं, इसलिए सरकार को कोई भी काम मनमर्जी का और आसानी से नहीं करने देंगे।

इसीलिए सदन की परंपराओं से अलग हटकर भी मांग रखी जा रही है। लोकसभा की परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति का अभिभाषण होने के बाद उसके धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा होती है। और उस दौरान कोई नया प्रस्ताव नहीं लिया जाता है। किंतु विपक्ष इस बार धन्यवाद प्रस्ताव के पहले नीट मामले पर चर्चा करना चाहता है। इस पर सत्ता पक्ष का कहना है कि राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में नीट का भी उल्लेख कर दिया है। यदि विपक्ष चाहे तो इस दौरान अपनी बात रख सकता है। किंतु विपक्ष इस पर अलग से चर्चा चाहता है ताकि सब कुछ रिकार्ड पर रहे। इसी को लेकर सदन में तनातनी रही। इसी के चलते शुक्रवार को अध्यक्ष ने पहली बार लगभग आधे घंटे के लिए और दूसरी बार सोमवार तक के लिए लोस की कार्यवाही स्थगित कर दी। यानी सदन का शुक्रवार का दिन बिना किसी चर्चा के चला गया और जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा सत्ता पक्ष और विपक्ष की जोर आजमाइश में बर्बाद हो गया। अभी यह मामला कितने दिन तक चलेगा कहा नहीं जा सकता।

इसके अलावा विपक्ष सदन में बेबुनियाद नैरेटिव भी गढ़ने में लगा हुआ है। हुआ यह कि सदन में विपक्ष के नेता राहुल गांधी अपनी बात रखने के लिए खड़े हुए तभी उनके माइक में कुछ तकनीकी दिक्कत आ गई और आवाज थोड़ी देर के लिए बंद हो गई। इसको भी लेकर विपक्ष ने आरोप लगा दिया कि अध्यक्ष ने राहुल गांधी की आवाज बंद कर दी है। हरियाणा से कांग्रेस के सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने इसे तूल देते हुए कहा कि सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज दबाना चाहता है। इस पर अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि उनके पास किसी की माइक की आवाज बंद करने का कोई बटन नहीं है। इस तरह के बेबुनियाद आरोप न लगाए जाएं। ऐसे में लगता है कि माइक की आवाज बंद करने का आरोप सिर्फ सदन को बाधित करने का प्रयास है। विपक्ष इसे बिना वजह मुद्दा बना रहा है। जबकि सच्चाई भी यही है कि अध्यक्ष के पास ऐसा कोई बटन होता ही नहीं है जिससे किसी सांसद के माइक की आवाज बंद की जा सके। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि विपक्ष इस सदन में सवाल उठाना या चर्चा ही नहीं करना चाहता, जैसा कि उनके नेताओं ने लोकसभा में किया। वे राज्सभा में भी यही काम करना चाहते हैं। सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि विपक्ष का उद्देश्य सवाल नहीं बवाल है।

विपक्ष के पास इस समय सरकार को घेरने के लिए सबसे बड़ा मुद्दा नीट पेपर लीक कांड है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर हमलावर है। पूरे देश में जगह-जगह कांग्रेस और लेफ्ट के कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। शुक्रवार को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने परंपरा से अलग हटकर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा को रोक कर इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की थी। उन्होंने स्थगन प्रस्ताव के जरिए अध्यक्ष से मांग की कि धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा को रोक कर पहले नीट पर चर्चा कराई जाए। किंतु अध्यक्ष ने कहा कि ऐसी कोई परंपरा नहीं है कि हम धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा होकर नीट पर चर्चा कराएं। उनका कहना है कि जब धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हो जाती है तो फिर कोई और प्रस्ताव नहीं लिया जा सकता। उन्होंने राहुल की मांग खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष अगर चाहे तो धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के बाद इस पर चर्चा कराई जा सकती है। वैसे राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी नीट का उल्लेख है। आप चाहें तो अपना समय इस चर्चा पर लगा सकते हैं। फिर भी विपक्ष अपनी मांग पर अड़ा रहा और अंततः सदन सोमवार तक के लिए स्थगित कर देना पड़ा। 18वीं लोकसभा की शुरुआत होने के पहले से ही नीट का मामला चर्चा में आ गया है। इस मुद्दे पर सरकार असहज महसूस कर रही है।

विपक्ष की मांग है कि नीट परीक्षा में धांधली के आरोपों के चलते शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए या सरकार को ही उन्हें हटा देना चाहिए। क्योंकि उनके रहते जांच संस्थाएं सही काम नहीं कर पाएंगीं और बच्चों को न्याय नहीं मिल पाएगा। हालांकि सरकार का कहना है कि इस मामले में जांच संस्थाएं अपने तरीके से कम कर रही हैं। सीबीआई जांच कर रही है और मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो आदेश होगा उसके हिसाब से कार्रवाई की जाएगी। किंतु विपक्ष नीट परीक्षा को ही रद्द कराना चाहता है। परंतु छात्रों का एक समूह इसे रद्द करने के खिलाफ है। उनका कहना है कि कुछ लोगों की गलती की सजा हम क्यों भुगतें। इसी को लेकर सदन में दोनों पक्षों में तनातनी बनी हुई है। कोई पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा। इसके अलावा एनटीए द्वारा कराई गईं कुछ और परीक्षाएं भी स्थगित की गई हैं। उन्हें नये तरीके से कराने के लिए तारीखों का ऐलान भी कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि नीट मामला सुप्रीम कोर्ट के पास विचाराधीन है इसलिए सरकार चाह कर भी इसमें कोई नया कदम नहीं उठा सकती। हालांकि विभागीय कार्रवाई से लेकर सीबीआई जांच चालू है।

लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्ष का अग्निवीर का भी एक मुद्दा छाया रहा। समूचा विपक्ष इस योजना को खत्म करने की मांग कर रहा है। किंतु सरकार इसे सही साबित करने पर तुली हुई है। लगता है कि नीट परीक्षा मामले पर हल निकलेगा तो उसके बाद विपक्ष अग्निवीर के मुद्दे को उठाएगा। विपक्ष का कहना है की अग्निवीर को 4 साल बाद रिटायर कर दिया जा रहा है। इसके बाद वह फिर वह कहां जाएगा, उसके किसी और नौकरी में एडजस्ट करने की क्या व्यवस्था है। चूंकि इस पर कोई समुचित व्यवस्था नहीं है, ऐसे में इनका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। वे सड़क पर आ जाएंगे। उधर सरकार इस योजना को खत्म करने के मूड में नहीं है। इस बारे में अंदरूनी खबर यह है कि जनता दल यूनाइटेड के दबाव में सरकार अग्निवीर योजना की कुछ सेवा शर्तों में बदलाव कर सकती है। जिसमें सेवाकाल बढ़ाने से लेकर रिटायरमेंट के बाद अग्निवीरों की सुविधाओं में कुछ बढ़ोतरी की जा सकती है। किंतु इस बाबत स्पष्ट बयान सरकारी पक्ष की ओर से अभी नहीं आया है। उधर इतना तय है कि नीट मामले से फुर्सत पाने के बाद अग्निवीर विपक्ष का बहुत बड़ा हथियार होगा। जिसके दम पर वह सरकार को सदन में और बाहर परेशान कर सकता है।

हालांकि इस बार मजबूती में आने के बाद विपक्ष ने इवीएम का मुद्दा उतनी जोरदारी से नहीं उठाया जितने की उससे अपेक्षा की गई थी। किंतु जहां-जहां विपक्ष की हार होती है वहां उसके दुरुपयोग का मामला सामने आ ही जाता है। उधर सत्ता पक्ष का आरोप है कि विपक्ष इस मामले में सुविधा की राजनीति कहता है। सत्ता पक्ष का कहना है कि जब विपक्ष कहीं जीत जाता है तो वह इवीएम पर चुप हो जाता है और जहां पर उसकी हार हो जाती है है, वहां पर इवीएम का रोना शुरू हो जाता है। सत्ता पक्ष का कहना है कि दरअसल विपक्ष इवीएम की आड़ में अपनी हार छुपाने का प्रयास करता है। खैर, यह एक ऐसा मुद्दा है जिसको विपक्ष कभी भी, कहीं भी इस्तेमाल कर सकता है। उसकी परेशानी ईवीएम नहीं है, उसकी परेशानी अपनी हार को छुपाने के हथियार की है।

18वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में आरक्षण भी एक ऐसा मुद्दा रहा जिसने एनडीए को एक कदम पीछे कर दिया है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और उसके गठबंधन साथियों ने आरक्षण को इस तरह पेश किया है कि जैसे सत्ता पक्ष आरक्षण खत्म करने पर आमादा है। दरअसल एनडीए के 400 पार के नारे के समर्थन में कुछ जगहों पर भाजपा नेताओं ने यह बयान दे दिया कि हमें संविधान बदलने के लिए 400 पार का आंकड़ा चाहिए, सरकार तो हम 272 पर ही बना लेंगे। इसमें फैजाबाद के भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह का नाम विशेष रूप से सामने आया। बस इसी बात को विपक्ष ने पकड़ लिया। उसने दलित और पिछड़े वर्ग में यह बात बैठा दी कि भाजपा 400 सीट इसलिए चाहती है ताकि वह संविधान में संशोधन करके आरक्षण खत्म कर दे। भोले-भाले दलित और पिछडे विपक्ष के इस झांसे में आ गए और उन्होंने अपने मतदान की दिशा बदल दी। चुनाव जीत जाने के बाद भी विपक्ष इस मसले को छोड़ना नहीं चाहता। उसके सांसदों ने जब लोकसभा में सदस्यता की शपथ ली तो संविधान हाथ में लेकर। उनका एक ही लाइन का कहना है कि भाजपा संविधान को खत्म करना चाहती है और हम संविधान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। और एनडीए को किसी कीमत पर सफल नहीं होने देंगे। आने वाले दिनों में भी संसद में चर्चा के दौरान आरक्षण और संविधान एक ऐसा मुद्दा होगा जिस पर जोरदार बहस होने की उम्मीद है।

इसी तरह बेरोजगारी के मुद्दे पर भी विपक्ष सत्तापक्ष को लगातार घेर रहा है। उसका आरोप है कि तमाम भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक कर दिए जा रहे हैं। इसके चलते भर्ती नहीं हो पा रही है और वे बेरोजगार घूम रहे हैं। सीधे-साधे आरोप है कि पेपर लीक जानबूझकर कराया जा रहा है ताकि युवाओं को नौकरी न देना पड़े। विपक्ष इसे सरकार की नाकामयाबी के रूप में देख रहा है। उसका कहना है कि अगर भर्ती होंगी तो उसमें आरक्षण भी लागू होगा और आरक्षण लागू होगा तो भाजपा का वह एजेंडा पूरा नहीं हो पाएगा जिसमें वह दलित और पिछड़े को नौकरी से वंचित करना चाहती है। दुर्भाग्यवश पिछले सालों में कई नौकरियों के लिए परीक्षाएं हुईं और गड़बड़ी की शिकायतें आईं, जिसके चलते परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं। हालांकि जांच के नाम पर सरकार सक्रिय है और कार्रवाई कर रही है। किंतु विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठा दिया है और कहा है कि सरकार युवाओं को बेरोजगार रखना चाहती है। इसीलिए भर्ती परीक्षा में सख्ती नहीं कर पा रही है। इस मुद्दे ने भी पिछले लोस चुनाव में युवाओं को अपने वोट की दिशा बदलने को मजबूर किया। उनसे बातचीत में यही बात निकल कर आई कि विपक्ष की बात सही है, सरकार नहीं चाहती कि युवाओं को नौकरी मिले और वे अपने पैरों पर खड़ा हो सके। ऐसे में यह एक ऐसा मुद्दा है जो कभी खत्म नहीं होने वाला। और विपक्ष जब चाहे इसके लिए बवाल कर सकता है।

विपक्ष किसान समस्याओं को लेकर भी मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में लगातार हमलावर रहा। किसान कई महीने तक दिल्ली के बॉर्डर पर जमे रहे, लंगर चलते रहे। खबरें तो यहां तक हैं कि आंदोलन को विदेशी ताकतों की भी मदद मिली। इस पर तमाम किसान नेता सवालों के घेरे में आते रहे। उस समय नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों के हित में तीन कानून पास किए थे। लेकिन विपक्ष और किसानों का दबाव ऐसा पडा कि सरकार को तीनों कानून वापस लेने पड़े। विपक्ष ने इसे अपनी जीत के रूप में लिया है। इस मामले में विपक्ष को किसानों का वोट भी मिला है। किसान आंदोलन के दौरान ही कुछ नेताओं की गलत हरकतों के चलते केंद्र सरकार को शर्मसार होना पड़ा। ऐसे तमाम लोगों को जनता ने कुर्सी से उतार भी दिया। यूपी का ऐसा ही एक मामला केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के लड़के का था। उस पर आरोप है कि उसने धरनारत किसानों पर गाड़ी चढ़ा दी। उस पर मुकदमा भी चला। मगर भाजपा ने अजय टेनी को पुनः वहां से टिकट दे दिया। इसके चलते भाजपा वहां हार गई। इस प्रकार किसानों का मुद्दा दोनों सदनों में छाए रहने वाला है। और विपक्ष इसको एक अपने मजबूत हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगा।

अब बात करते हैं विपक्ष की एकता के बरकरार रहने या न रहने की। शुरुआत बिहार से। बिहार की जनता दल यूनाइटेड अभी नरेंद्र मोदी सरकार की एक मजबूत बैसाखी के रूप में काम कर रही है। विशेषज्ञ लगातार इस बात की चर्चा करते रहते हैं कि नीतीश कुमार कभी भी पलटी मार सकते हैं। इधर बिहार भाजपा के नेता अश्विनी चौबे ने एक बयान दे दिया है कि समय आ गया है कि भाजपा को बिहार में अपने बूते चुनाव लड़ना चाहिए और एनडीए का नेतृत्व करना चाहिए। इस बयान को लेकर सरगर्मी शुरू हो गई है। हालांकि भाजपा ने अश्वनी चौबे की बात को सिरे से खारिज कर दिया है। उसके बिहार के दोनों डिप्टी सीएम ने भी पहले ही कह दिया है कि हम अगला चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ेंगे। उधर जनता दल यूनाइटेड ने भी साफ कर दिया है कि नरेंद्र मोदी और बिहार के दोनों वरिष्ठ नेताओं के बयान के बाद इस मामले पर वार्ता करने के लिए कुछ नहीं बचता है। जनता दल यूनाइटेड के प्रधान महासचिव केसी त्यागी इस बारे में सारी चर्चाओं को विराम देते हुए कहते हैं कि हम अगला चुनाव भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ेंगे। वैसे भी नीतीश कुमार ने शनिवार को अपनी पार्टी की बैठक में जिस संजय झा को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है वे भाजपा समर्थक माने जाते हैं। जदयू में आने के पूर्व वे भाजपा ने थे और अरुण जेटली के खास हुआ करते थे।

इसी प्रकार महाराष्ट्र में भी पिछले दिनों मीडिया में खबरें आईं कि भाजपा नेता और महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उद्धव ठाकरे की मुलाकात हुई है। एक फोटो भी वायरल है। इसको लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है कि उद्धव ठाकरे कभी भी एनडीए में आ सकते हैं। दोनों पार्टियों के जिम्मेदार नेताओं का मानना है कि महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना ही सबसे नेचुरल एलाइंस हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सपा और कांग्रेस में भी मनमुटाव की खबरें हैं। चर्चाएं हैं कि अखिलेश यादव को कांग्रेस का वोट कन्नौज में नहीं मिला लेकिन कांग्रेस को सपा का वोट रायबरेली में मिल गया। इसको लेकर भी अंदर कुछ खटास की खबर है। लेकिन अभी ऊपर ऊपर दोनों पार्टियां एकजुट होने का ही मुजाहिरा कर रही हैं। परंतु राजनीति संभावनाओं का खेल और आवश्यकताओं का मेल है। कब कौन पार्टी बदल जाए, कोई नहीं जानता। ऐसे में आने वाले दिनों में लोस का क्या स्वरूप होगा, ये अभी से कह पाना मुश्किल है।

अभयानंद शुक्ल
राजनीतिक विश्लेषक