राजनीतिक वफादारी में तो कांग्रेस से बीस है सपा

राहुल गांधी और डिंपल यादव के रणछोड़दास होने के बावजूद दोनों पार्टियों की राजनीतिक स्वीकार्यता में बड़ा अंतर है कन्नौज में जहां पार्टीजनों ने बड़े उत्साह के साथ अखिलेश यादव को हाथों हाथ लिया वहीं अमेठी के कांग्रेसी निराश हैं

0
248

लखनऊ। अपनी जीती हुई परंपरागत सीट छोड़कर किसी और सीट पर लड़ने का साहस दिखाना किसी राजनेता का बहादुरी भरा कदम है। किंतु अपनी खानदानी सीट पर हार जाने के बाद उसे छोड़कर किसी जिताऊ सीट की तलाश करना राजनीतिक बुजदिली कहा जाएगा। इस लिहाज से कांग्रेस के रायबरेली के उम्मीदवार राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी की मैनपुरी से उम्मीदवार डिंपल यादव में काफी समानता है। राहुल गांधी ने जहां अपनी परंपरागत सीट अमेठी से हारने के बाद उसका परित्याग कर रायबरेली की राह पकड़ ली है वहीं डिंपल ने भी अपनी परंपरागत सीट कन्नौज से हारने के बाद पार्टी की सर्वाधिक सुरक्षित सीट मैनपुरी का दामन पकड़ लिया है। इसको लेकर राजनीतिक हलके में चर्चाओं का बाजार गर्म है।

दोनों पार्टियों के इन दोनों प्रत्याशियों में इस समानता के बावजूद कि दोनों ने अपनी हारी हुई परंपरागत सीट का परित्याग किया है, दोनों पार्टियों की राजनीतिक सोच में अंतर है। कांग्रेस पार्टी ने जहां अमेठी को गांधी परिवार से महरूम कर दिया है वहीं समाजवादी पार्टी ने अपनी हारी हुई कन्नौज सीट पर अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को ही उतार दिया है। और यह उनकी जनता के प्रति राजनीतिक वफादारी का प्रतीक है। इससे समाजवादी पार्टी की राजनीतिक हैसियत का पता चलता है। इस निर्णय से कन्नौज की जनता में कुछ अलग ही उत्साह दिखाई दे रहा है। कन्नौज की जनता ने इसका मुजाहिरा अखिलेश यादव और राहुल गांधी की संयुक्त सभा में शुक्रवार को कर ही दिया। सभा मैं आई भीड़ बहुत उत्साहित लग रही थी। इससे वहां के चुनावी माहौल का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

इसके उलट अमेठी के लोगों का कहना है कि राहुल गांधी ने हमारे साथ धोखा किया है। अगर हमने किसी कारण से उन्हें 2019 में हरा दिया तो इसका मतलब यह नहीं कि वे मैदान छोड़कर भाग जाएं। उन्हें फिर से प्रयास करना चाहिए था और अपनी हार के कारणों पर मंथन करके नए सिरे से मैदान में आना चाहिए था। अमेठी के कांग्रेस कार्यकर्ता आखिरी समय तक राहुल गांधी का इंतजार करते रहे। उनका कहना है कि अब हमारे पास दूसरा विकल्प चुनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है। उनका मानना है कि अगर किसी कारणवश राहुल गांधी ने अमेठी से चुनाव नहीं लड़ा तो कम से कम गांधी परिवार का ही कोई और व्यक्ति मैदान में आना चाहिए था। इस प्रकार तो कांग्रेस ने स्मृति ईरानी के लिए खुला मैदान छोड़ दिया है। पार्टी जनों का मानना है कि कांग्रेस के घोषित उम्मीदवार किशोरी लाल शर्मा अच्छे व्यक्ति हैं किंतु उनमें चुनाव लड़ने की राजनीतिक परिपक्वता नहीं है।

किसी के कहने पर कोई व्यवस्था कर देना अलग बात है लेकिन नेता के रूप में किसी को अपने हिसाब से व्यवस्था करने का निर्देश देना अलग बात है। इस लिहाज से किशोरी लाल शर्मा स्मृति ईरानी के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। वैसे जनता तो जनार्दन होती है। उसका दिल कब किस बात पर किस पर आ जाए, कहा नहीं जा सकता। उसका अंतिम समय का निर्णय राजनीतिक परिणाम बदल कर रख देता है। अब देखें अमेठी में क्या होता है। खैर, दोनों सीटों पर परिणाम चाहे जो भी हो किंतु राजनीतिक नैतिकता के लिहाज से समाजवादी पार्टी कांग्रेस पर भारी दिखाई दे रही है। शायद इसीलिए अभी भी प्रदेश में समाजवादी पार्टी की उम्मीदें कांग्रेस की तुलना में अधिक दिखाई दे रही हैं।

बात अमेठी सीट की करें तो यह सीट स्वर्गीय संजय गांधी के समय से गांधी परिवार की विरासत रही है। स्वर्गीय संजय गांधी के बाद एक बार यहां पर कांग्रेस नेता सतीश शर्मा भी चुनाव जीते हैं जो गांधी परिवार के करीबी रहे। उसके बाद स्वर्गीय राजीव गांधी यहां से चुनाव जीतते रहे। स्वर्गीय राजीव गांधी के बाद सोनिया गांधी ने भी यहां का प्रतिनिधित्व किया था। उसके बाद सोनिया गांधी में इस सीट को राहुल गांधी के लिए छोड़ दिया और खुद रायबरेली से लड़ने चली गईं। तब से रायबरेली सीट सोनिया की हुई और अमेठी सीट राहुल गांधी की लेकिन 2019 में स्मृति ईरानी से चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने इस बार अमेठी सीट का त्याग कर दिया है जिसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में थमने का नाम नहीं ले रही है।

इसी प्रकार कन्नौज की सीट भी समाजवादी पार्टी का गढ़ रहीं है। यहां से मुलायम सिंह यादव ने भी चुनाव जीता था। फिर अखिलेश यादव यहां से जीतते रहे। 2014 के चुनाव में डिंपल यादव ने कन्नौज का किला फतह किया था और संसद पहुंची थीं। 2019 में भाजपा के सुब्रत पाठक ने उन्हें हरा दिया था। हारने के बाद डिंपल यादव ने अपने ससुर स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की परंपरागत सीट मैनपुरी का रुख कर लिया। पर समाजवादी पार्टी ने कन्नौज को निराश नहीं किया। पार्टी ने यहां से राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को मैदान में उतारा है। अखिलेश यादव के पर्चा दाखिल करने के बाद सपाइयों में बहुत जोश है। यहां मुकाबला काफी रोचक हो गया है। इस सीट पर हार जीत का निर्णय जो भी हो किंतु सपाइयों को इस बात का संतोष है कि उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष में संकट काल में भी उनका साथ नहीं छोड़ा।

राहुल गांधी और डिंपल यादव के रणछोड़ दास होने के बावजूद अमेठी में जहां पार्टी के नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस से निराशा हैं वहीं कन्नौज के सपाई अखिलेश यादव के पीछे खड़े दिख रहे हैं । दोनों सीटों पर परिणाम चाहे जो हो पर राजनीतिक नैतिकता के लिहाज से समाजवादी पार्टी कांग्रेस पर भारी दिखाई दे रही है। शायद इसीलिए अभी भी प्रदेश में समाजवादी पार्टी की उम्मीदें कांग्रेस की तुलना में अधिक दिखाई दे रही हैं।

अभयानंद शुक्ल
राजनीतिक विश्लेषक