यूपी के उपचुनाव में मनोबल दांव पर

* इंडी गठबंधन को जहां जीत की लय बरकरार रखना है वहीं एनडीए को सम्मान वापस पाना है * उपचुनाव के परिणाम तय करेंगे 2027 के विधानसभा चुनाव की दशा और दिशा * दोनों ही गठबंधन पूरी ताकत से उपचुनाव की रणनीति तैयार करने में लगे हैं, बैठकें जारी * जीत के लिए प्रदेश के 21 फ़ीसद दलित वोटरों को भी रिझाने की कोशिशें हुईं तेज

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लखनऊ। हालांकि यूपी में खाली हुई 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव की अभी तक घोषणा नहीं हुई है पर सभी पार्टियों में इसके लिए तैयारियां तेज हैं। बैठकों का दौर जारी है और जिताऊ प्रत्याशियों की तलाश चल रही है। ये उपचुनाव यह भी तय करेंगे कि किसका मनोबल टूटेगा, किसका ऊंचा होगा। ये उपचुनाव 2027 के विधानसभा चुनाव की पिच भी तैयार करेंगे जिस पर आगे चलकर पक्ष और विपक्ष चुनावी बैटिंग और बालिंग करेंगे। सूत्रों की खबर है कि संसद का बजट सत्र खत्म होते ही इन चुनावों की घोषणा कर दी जाएगी।

उत्तर प्रदेश का विधानसभा उपचुनाव वास्तव में दोनों गठबंधनों के मनोबल की परीक्षा है। इसके लिए एनडीए और इंडी गठबंधन ने अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है। इस सिलसिले में बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष गत लोकसभा चुनाव में हार की समीक्षा के साथ-साथ इन 10 सीटों पर उपचुनाव की तैयारियों का जायजा लेने गत दिनों लखनऊ आए। उनके साथ हुई बैठक के बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने बताया कि उपचुनाव के लिए हमारी सारी तैयारियां पूरी हैं।

सूत्रों का कहना है कि एनडीए लोकसभा चुनाव के खराब प्रदर्शन को भुलाकर पूरी ताकत से उपचुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गया है। मुख्यमंत्री योगी ने डेढ़ दर्जन मंत्रियों को इन सीटों का प्रभारी भी बना दिया है। भाजपा को उम्मीद है कि इस बार अच्छे प्रदर्शन से एक बार फिर कार्यकर्ताओं में जोश आ जाएगा। बीएल संतोष ने भी दो दिवसीय समीक्षा में उपचुनाव में जीत का संकल्प लेकर काम करने की नसीहत दी है। उन्होंने पार्टी जनों से दलितों पर फोकस बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। पार्टी ने इस दिशा में काम भी करना शुरू कर दिया है। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपने स्तर पर दलित बस्तियों में काम शुरू कर दिया है।

10 विधानसभा सीटों जहां उपचुनाव होने हैं उनमें प्रयागराज जिले की फूलपुर, अलीगढ़ की खैर, गाजियाबाद की गाजियाबाद, मिर्जापुर की मझवां, मुजफ्फरनगर की मीरापुर, अयोध्या-फैजाबाद की मिल्कीपुर, मैनपुरी की करहल, अंबेडकरनगर की कटेहरी, मुरादाबाद की कुंदरकी और कानपुर की सीसामऊ सीटें शामिल हैं। लोकसभा की तरह इस उपचुनाव में भी एनडीए और इंडी गठबंधन के बीच मुकाबला देखने को मिल सकता है। हालांकि इस बार बसपा भी हुंकार भर रही है। सपा अपनी पांच सीटों के साथ अन्य सीटों पर भी चुनाव लड़ सकती है। कांग्रेस भी गाजियाबाद समेत पश्चिम की दो सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग कर सकती है। इसी तरह बीजेपी की सहयोगी रालोद चंदन चौहान के सांसद बनने के बाद मीरापुर के अलावा अलीगढ़ की खैर सीट पर भी दावा कर सकती है।

निषाद पार्टी भी मझवां सीट पर दावेदारी पेश कर सकती है। मझवां से निषाद पार्टी के विधायक रहे विनोद कुमार बिंद भदोही से सांसद बन गए हैं। राज्यमंत्री अनूप प्रधान वाल्मीकि भी बीजेपी के टिकट पर हाथरस से सांसद चुने गए हैं। अनूप खैर से विधायक थे इसलिए वहां भी उपचुनाव होना है। फूलपुर सीट से बीजेपी विधायक प्रवीण पटेल अब फूलपुर से सांसद बन गए है। फूलपुर विधानसभा भी सीट रिक्त हुई है। संभल से सपा के जियाउर्रहमान के सांसद बनने के बाद उनकी कुंदरकी सीट भी खाली हो गई है। इसके अलावा सपा विधायक इरफान सोलंकी को सजा होने और सदस्यता जाने के बाद कानपुर की सीसामऊ सीट भी खाली हुई है।गाजियाबाद से सांसद बने अतुल गर्ग वहीं से विधायक थे। इसलिए इस विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव होना है। इस तरह कुल 10 सीटों में से 5 सीटों पर समाजवादी पार्टी का कब्जा था। बाकी बची 5 सीटों में पर बीजेपी के 3 और निषाद पार्टी व आरएलडी का 1-1 विधायक थे।

उपचुनाव की तैयारियों की बाबत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा है कि हमारी तैयारियां पूरी हैं। हमारे कार्यकर्ता भी जोश में हैं। प्रदेश कांग्रेस ने सूबे के सभी विधानसभा क्षेत्रों में दलित संवाद किया है। यह कार्यक्रम छह से आठ जुलाई तक तीन दिन चला। कांग्रेस के जिम्मेदार नेताओं को लगता है कि उसके वोट बैंक से छिटक गया दलित वर्ग बड़ी मुश्किल से हाथ लगा है। ऐसे में इसे हर हाल में अपने साथ बनाए रखना है। उधर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया तेज कर दी है। वे लोगों से राय ले रहे हैं। वे इस मामले पर इतने संजीदा हैं कि उन्होंने कार्यालय को ही अपना घर बना लिया है।

यहां एक बात उल्लेखनीय है कि कांग्रेस और सपा दोनों ही अपने अपने-तरीके से सभी 10 सीटों पर उपचुनाव की तैयारियां कर रहे हैं। अभी तक उपचुनाव साथ-साथ लड़ने की कोई औपचारिक घोषणा दोनों ही पार्टियों द्वारा नहीं की गई है। ऐसे में कहीं इनके रिश्ते दिल्ली जैसे न हो जाएं, इसकी आशंका जताई जा रही है। इस बाबत सूत्रों का दावा है कि दोनों पार्टियों में उपरी तौर पर भले सब कुछ सामान्य दिख रहा हो पर अंदर अंदर चीजें सामान्य नहीं हैं। ऐसे में इस बात की आशंका है कि जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ किया था वैसा ही यूपी में न हो जाए। उल्लेखनीय है कि आप ने लोकसभा चुनाव खत्म होते ही कांग्रेस से गठबंधन तोड़ लिया था। अब देखना है कि क्या यूपी में भी ऐसा कुछ होगा या दोनों साथ मिलकर उपचुनाव में उतरेंगे।

इस उपचुनाव में किसी भी सीट की नवैयत बदल जाने पर मनोबल पर असर पड़ना स्वाभाविक है। फिर दोनों गठबंधनों में व्यंग्य बाण चलने स्वाभाविक हैं। जहां तक फैजाबाद की मिल्कीपुर विधानसभा सीट का सवाल है, तो इस सीट पर सपा के अवधेश प्रसाद पासी विधायक थे जो अब अयोध्या-फैजाबाद के सांसद हो गये हैं। चर्चा है कि जब अवधेश प्रसाद पासी ने फैजाबाद सीट से जीत कर अपने गठबंधन की नाक ऊंची कर दी है तो इनाम स्वरूप उनके बेटे को यहां से टिकट मिल सकता है। जहां तक करहल सीट का सवाल है तो यहां अखिलेश यादव विधायक थे। अब वे कन्नौज से सांसद हो गये हैं। ऐसे में करहल सीट से मुलायम परिवार के तेज प्रताप यादव को लड़ाने की चर्चा है। ये दोनों सीटें सपा के सम्मान से जुड़ी हैं और यहां मूंछ की लड़ाई होगी। हालांकि उपचुनाव वाली भाजपा की तीनों सीटें महत्वपूर्ण हैं। किन्तु सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण सीट गाजियाबाद है। जहां उसके विधायक अतुल गर्ग सांसद सांसद बन गए हैं। इस सीट पर भी भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर होगी।

उपचुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो पर प्रदेश के 21 फ़ीसद दलित वोटर इस समय महत्वपूर्ण हो गये हैं। इनको अपने पक्ष में करने के लिए सभी दलों की कवायद शुरू है। भाजपा, सपा और कांग्रेस के अलावा बहुजन समाज पार्टी ने भी रणनीति बनाने शुरू कर दी है। इस बाबत भाजपा प्रवक्ता अवनीश त्यागी का कहना है कि विपक्ष दलितों-पिछड़ों का विरोधी है। उसने उनके आरक्षण का विरोध किया है। जबकि भाजपा ने उनके लिए अधिक काम किया है। कांग्रेस प्रवक्ता अंशु अवस्थी का कहना है कि दलित वोटरों को रिझाने के लिए कांग्रेस हर विधानसभा क्षेत्र से 1000 दलितों को पार्टी से जोड़ेगी।

दरअसल 2024 के लोस चुनाव में मायावती के दलित वोट बैंक का काफी हिस्सा टूटकर इंडिया और एनडीए के पास चला गया है। इसमें से दो तिहाई से अधिक अखिलेश यादव और गठबंधन को मिला है जबकि बाकी एनडीए को। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के 21 फ़ीसद से अधिक दलित वोटरों में से 12% जाटव हैं। हाथरस कांड वाला बाबा नारायण साकार हरि इसी बिरादरी बिरादरी का है। इसलिए राजनीतिक दल इस मामले में बहुत सावधानी बरत रहे हैं। इस मामले में अकेली बसपा सुप्रीमो मायावती ही हैं जिन्होंने खुलकर नारायण साकार हरि उर्फ भोले बाबा के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।

अभयानंद शुक्ल
राजनीतिक विश्लेषक