विजय के शपथग्रहण में वंदे मातरम्, जय हो

राजनीति में संकेतों की भाषा का प्रयोग अधिक होता है। इसमें मन की बात बिना कहे, बता दी जाती है। ऐसा ही कुछ तमिलनाडु में टीवीके प्रमुख विजय जोसेफ के शपथ समारोह में भी दिखा। भारत के इतिहास में संभवतः पहली बार किसी मुख्यमंत्री के शपथ के पूर्व वंदे मातरम् का गायन हुआ। ऐसा तो पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी के शपथ समारोह में भी नहीं हुआ। ऐसा कर टीवीके प्रमुख विजय ने बड़ी शालीनता से वो संदेश दे दिया है, जिसकी वर्षों से प्रतीक्षा थी। और ये संदेश दूरगामी परिणाम वाला है।

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लखनऊ। राजनीति में संकेतों की भाषा का प्रयोग अधिक होता है। इसमें मन की बात बिना कहे, बता दी जाती है। ऐसा ही कुछ तमिलनाडु में टीवीके प्रमुख विजय जोसेफ के शपथ समारोह में भी दिखा। भारत के इतिहास में संभवतः पहली बार किसी मुख्यमंत्री के शपथ के पूर्व वंदे मातरम् का गायन हुआ। ऐसा तो पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी के शपथ समारोह में भी नहीं हुआ। ऐसा कर टीवीके प्रमुख विजय ने बड़ी शालीनता से वो संदेश दे दिया है, जिसकी वर्षों से प्रतीक्षा थी। और ये संदेश दूरगामी परिणाम वाला है।

* तमिलनाडु की नई सरकार में मिला राष्ट्र गीत को सम्मान
* पहले वंदे मातरम, फिर जन गण मन और आखिर में राज्य गीत
* ऐसा तो सुवेंदु के शपथ में भी नहीं हुआ जबकि पीएम भी थे

तमिलनाडु के नए चीफ मिनिस्टर और टीवीके नेता जोसेफ विजय के शपथ ग्रहण में सबसे पहले पूर्ण वंदे मातरम का गायन एक बड़ा सियासी संकेत है। इसे अगर राजनीतिक चश्मे से देखें तो इसका सीधा मतलब यह है कि विजय ने इसके जरिए केंद्रीय कैबिनेट के उस फैसले का समर्थन प्रदान कर दिया है, जिसमें वंदे मातरम को राष्ट्रगान के बराबर सम्मान देने की बात कही गई है। ऐसे में विजय के शपथ ग्रहण में वंदे मातरम् का गायन निश्चित रूप से बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है। सीधा संकेत यही है कि विजय ने इस राष्ट्र गीत को सम्मान देकर तमिलों को शेष भारत की मुख्य धारा से जोड़ने का इशारा कर दिया है। ये इस बात का भी संकेत है कि विजय का मोदी सरकार और भाजपा के लिए भी साफ्ट कार्नर है।

हालांकि विजय ने अपने घोषणा पत्र में भाजपा की हिंदुत्व की आईडियोलॉजी को खारिज किया है, लेकिन उनका ये राष्ट्रवाद भाजपा के एजेंडे से काफी मैच करता है। विजय का ये निर्णय तमिलनाडु को पश्चिम बंगाल से भी जोड़ता है, क्योंकि वंदे मातरम की रचना पश्चिम बंगाल की धरती पर ही हुई थी। संविधान सभा में इसे राष्ट्रगान के बराबर सम्मान देने की अपेक्षा की गई थी। और उसी अपेक्षा को मोदी सरकार ने अमली जामा पहनाया है।

ये घटना महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि पश्चिम बंगाल में सुवेंदु सरकार के शपथ ग्रहण में भी वंदे मातरम का गायन नहीं हुआ, जबकि उस कार्यक्रम में पीएम मोदी भी थे। पर विजय ने इस गायन को कराकर एक बड़ा मैसेज दिया है कि हम भी हिंदुस्तानी हैं, भले हम तमिल हैं। और यही बात उनको द्रविड़ राजनीति करने वाले डीएमके, एआईएडीएमके से अलग भी करती है। हो सकता है कि अभी वे भाजपा विरोधी खेमे में दिखाई दे रहे हों लेकिन उनका दिल और दिमाग हिंदुस्तानी है, यह बात इस गायन से साफ हो गया है। खास बात यह भी रही कि वंदे मातरम् का गायन के समय नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे।

केंद्र सरकार ने कुछ ही दिन पहले नई गाइडलाइंस जारी कीं थी, जिसमें ‘वंदे मातरम’ के पूरे छह छंदों वाले वर्जन को गाना अनिवार्य किया गया था। विजय के शपथ ग्रहण समारोह में भी राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम गाया गया। फिर राष्ट्रगान हुआ और उसके बाद तमिलनाडु का राज्य का गान हुआ। और यह वही तमिलनाडु है, जहां स्टालिन सरकार में वंदे मातरम न गाने और बजाने का आदेश था। हालांकि राज्य गीत को आखिर में गाने को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है।

उधर मुस्लिम खेमे में इस गीत को लेकर बड़ी प्रतिक्रिया देखी गईं। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तो इसे संविधान के खिलाफ करार दिया है। उन्होंने कहा है कि इसे हम पर थोपा नहीं जाना चाहिए। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि वे सिर कटा सकते हैं, पर ‘वंदे मातरम’ की विशेष पंक्तियां नहीं गाएंगे, सुप्रीम कोर्ट अनिवार्य कर दे, तो भी । जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने भी कहा है कि “मर जाएंगे पर शिर्क नहीं” करेंगे। दूसरी ओर, आरिफ मोहम्मद खान जैसे नेताओं ने इसका उर्दू अनुवाद कर विवादों का जवाब दिया है।

इस राष्ट्र गीत की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 में बंगाल के कांतल पाड़ा (नयी हाटी) गांव में की थी। ये पहली बार 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ, और बाद में 1882 में उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया था। 6 मई 2026 को मोदी कैबिनेट ने इसके अपमान या गायन में बाधा डालने को दंडनीय अपराध बना दिया है। इसमें 3 साल तक की जेल हो सकती है।

अभयानंद शुक्ल
राजनीतिक विश्लेषक