लोकतंत्र में ‘हिट’ और ‘जूते-चप्पल’ की भाषा

लोकतंत्र की बुनियाद इस बात पर टिकी होती है कि देश का आखिरी नागरिक भी बिना किसी डर के अपने हक की आवाज उठा सके। लेकिन जब सत्ता की गलियारों से नागरिकों को 'कॉकरोच' समझने की 'बू' आने लगे, और असहमति की आवाज दबाने के लिए 'हिट (कीटनाशक)' या 'जूते-चप्पल' का खौफ दिखाया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था गम्भीर रूप से बीमार हो चुकी है।

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लोकतंत्र में ‘हिट’ और ‘जूते-चप्पल’ की भाषा……
​लोकतंत्र की बुनियाद इस बात पर टिकी होती है कि देश का आखिरी नागरिक भी बिना किसी डर के अपने हक की आवाज उठा सके। लेकिन जब सत्ता की गलियारों से नागरिकों को ‘कॉकरोच’ समझने की ‘बू’ आने लगे, और असहमति की आवाज दबाने के लिए ‘हिट (कीटनाशक)’ या ‘जूते-चप्पल’ का खौफ दिखाया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था गम्भीर रूप से बीमार हो चुकी है।
​हालिया बयानों और धमकियों ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता के नशे में चूर हुक्मरान जनता को इंसान नहीं, बल्कि रेंगने वाले जीव समझने लगे हैं। यह खुला संदेश दिया जा रहा है कि “अगर हक मांगोगे, तो कुचल दिए जाओगे।” ​जिस जनता के वोटों की बैसाखी पर चढ़कर नेता सत्ता के ऊंचे सिंहासनों पर बैठते हैं, चुनाव जीतते ही उसी जनता को ‘कॉकरोच’ मान लेना कतई स्वीकार्य नहीं है। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन, अपनी मांगों को रखना और सरकार की नीतियों की आलोचना करना कोई अपराध नहीं, बल्कि एक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब जनता की आवाज को कीड़े-मकौड़ों की तरह कुचलने की कोशिश की गई है, तब-तब इसी जनता ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की ताकत से बड़े से बड़े साम्राज्य के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया है। ​’हिट’ रखने का दावा करना और जूते-चप्पल से मारने के नज़ारे पेश करना किसी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती। यह भाषा राजनीतिक दिवालिएपन और डराने की राजनीति को दर्शाती है।

सरकारें जनता की सेवा और सुरक्षा के लिए चुनी जाती हैं, उन्हें कुचलने के लिए नहीं। ​जब सत्ताधारियों के पास तर्कों और काम का जवाब नहीं होता, तो वे लाठी, जूते और कीटनाशक जैसी हिंसक रूपकों का सहारा लेने लगते हैं। ​एक जागरूक समाज कभी भी इस प्रकार की अमर्यादित और हिंसक भाषा को बर्दाश्त नहीं कर सकता। आज अगर एक वर्ग को ‘कॉकरोच’ कहकर कुचला जा रहा है, तो कल बारी किसी और की भी हो सकती है। सत्ता में बैठे लोगों को अपनी मर्यादा याद रखनी होगी, क्योंकि जनता ने उन्हें ‘सेवक’ चुना है,’तानाशाह’ नहीं। नागरिकों को भी यह समझना होगा कि अपने हक की आवाज उठाना कोई गुनाह नहीं है।

श्याम सिंह ‘पंवार’