जब वर्दी को ही ‘न्याय’ के लिए होना पड़े लामबंद !

कानपुर पुलिस कमिश्नरेट कार्यालय परिसर में जो मंजर दिखा, वह सिर्फ 40-50 आईटीबीपी जवानों और उनके उच्चाधिकारियों की मौजूदगी भर नहीं कह सकते, बल्कि यह हमारे ‘सिस्टम’ के गाल पर एक करारा तमाचा है। जब देश की सरहदों की हिफाजत करने वाले जवानों को अपने एक साथी की माँ के हाथ काटे जाने के मामले में इंसाफ की भीख मांगने के लिए इस तरह ‘लामबन्द’ होना पड़े, तो समझ लीजिए कि ‘आम आदमी के लिए न्याय’ एक दूर की कौड़ी बन चुका है।

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कानपुर पुलिस कमिश्नरेट कार्यालय परिसर में जो मंजर दिखा, वह सिर्फ 40-50 आईटीबीपी जवानों और उनके उच्चाधिकारियों की मौजूदगी भर नहीं कह सकते, बल्कि यह हमारे ‘सिस्टम’ के गाल पर एक करारा तमाचा है। जब देश की सरहदों की हिफाजत करने वाले जवानों को अपने एक साथी की माँ के हाथ काटे जाने के मामले में इंसाफ की भीख मांगने के लिए इस तरह ‘लामबन्द’ होना पड़े, तो समझ लीजिए कि ‘आम आदमी के लिए न्याय’ एक दूर की कौड़ी बन चुका है।

हालांकि, पुलिसिया आधिकारिक गलियारों में इसे ‘घेराव’ न कहकर एक सामान्य मुलाकात का नाम देकर रफा-दफा करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन सीधा सवाल यह है कि, ‘आखिर इतनी बड़ी संख्या में जवानों और उनके आला अधिकारियों को खुद, पुलिस आयुक्त कार्यालय क्यों आना पड़ा?’ जब जवान अकेले ही कार्रवाई की गुहार लेकर गया था, तो उसकी पीड़ा को तवज्जों क्यों नहीं की गई ?
क्या हमारे देश में न्याय की प्रक्रिया इतनी बहरी व अन्धी हो चुकी है कि जब तक बाहर बूटों की धमक और वर्दियों का हुजूम, आगजनी अथवा प्रदर्शन न दिखे, तब तक साहबों की नींद नहीं टूटती ?

क्लीन चिट का खेल और सिस्टम का निजी हास्पिटलों से गठबन्धन : ताजा मामला टाटमिल चौराहे पर स्थित कृष्णा हॉस्पिटल की कथित लापरवाही का है। आरोप संगीन हैं, आईटीबीपी के एक जवान की मां का हाथ काट दिया गया और रिपोर्ट में बीमारी को ही बदल दिया गया। लेकिन इस देश के भ्रष्ट तंत्र की सबसे पुरानी और घिनौनी स्क्रिप्ट देखिए, स्वास्थ्य विभाग ने हॉस्पिटल को ‘क्लीन चिट’ थमा दी! ऐसा ही अनेक मामलों में भी देखा जा चुका है और आम आदमी की आवाज को दबाया जा चुका है।

यह क्लीन चिट देना कोई नई बात नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग और निजी अस्पतालों के बीच के उस गठजोड़ का खुला सुबूत है जो अक्सर गरीबों और पीड़ितों की लाशों पर बैठकर अपनी तिजोरियां भरता है। आईटीबीपी के अधिकारियों ने इस जाँच पर जो सवाल उठाए हैं, वे बिल्कुल जायज हैं। जब मेडिकल रिपोर्टों में ही हेरफेर के आरोप लग रहे हों, तो स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या जिले का स्वास्थ्य विभाग, आम जनता की सेहत के लिए है या निजी अस्पतालों के गुनाहों पर पर्दा डालने का काम करने के लिये ?
इस पूरे घटनाक्रम ने कुछ बेहद कड़वे और सुलगते हुए सवाल हमारे सिस्टम के मुंह पर दे मारे हैं:-

क्या अब आईटीबीपी के जवान को न्याय मिल पाएगा? जो जवान सीमा पर देश के लिए जान हथेली पर लेकर खड़ा रहता है, जब उसका परिवार इस करप्ट सिस्टम के हाथों प्रताड़ित होता है, तो देश का मनोबल टूटता है। अगर रसूखदार अस्पताल और भ्रष्ट अधिकारियों के आगे एक जवान की आवाज दबा दी गई, तो सोंचिये कि आम आदमी का हाल क्या होगा?
सवाल यह भी उठता है कि, ‘क्या गरीबों की आवाज सुनी जा रही है?’

आज आईटीबीपी के जवान संगठित थे, उनके पीछे एक पूरा महकमा खड़ा था, तो वे पुलिस कमिश्नर तक पहुंच गए और मामला सुर्खियों में आ गया। लेकिन उस आम, गरीब और बेसहारा आदमी का क्या, जिसका कोई संगठन नहीं है? जो रोज ऐसे ही ‘निजी हॉस्पिटलों’ की लापरवाही और स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत का शिकार होकर दम तोड़ देता है? उसकी आवाज तो कमिश्नरेट की चौखट तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है। ऐसे मामले तो समय समय पर देखने को मिल ही चुके हैं जिनमें आम आदमी की आवाज को दबा दिया गया।
सिस्टम की फजीहत होती देख, पुलिस के अधिकारियों और आईटीबीपी अधिकारियों के बीच हुई बातचीत को लेकर तरह तरह के बयान दिये जा रहे हैं, आश्वासन के पुल बांधे जा रहे हैं। वहीं अगर इस देश में वर्दी और रसूख के बिना न्याय की गुंजाइश खत्म हो चुकी है, तो यह मान लेना चाहिए कि हमारा सिस्टम वेंटिलेटर पर है, जिसे सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की ऑक्सीजन मिल रही है।

अब देखना यह है कि कानपुर पुलिस कमिश्नरेट इस मामले में निष्पक्षता की मिसाल पेश करेगा या फिर एक ‘जांच का नाटक’ करके फाइल को बन्द कर देगा।

श्याम सिंह पंवार