भाग्य एवं कर्म का सामंजस्य

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जीवन में भाग्य एवं कर्म को अलग कर नहीं देेखा जा सकता। सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं…” जी हां, यह कथन व्यर्थ नहीं है। व्यक्ति कोे केवल भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए। असफलता के लिए केवल भाग्य को दोष देना कतई उचित नहीं। भाग्य एवं कर्म का समुचित सामंजस्य किसी को भी अपेक्षित सफलता देता है। राघव एवं माधव इसे कुछ अलग अंदाज में रेखांकित करते हैं। हालांकि राघव एवं माधव मूलरूप से अलग अलग पेशे से थे लेकिन चातुर्य में कोई किसी से कम नहीं। एक दिन राघव ने माधव के दर्शनशास्त्र की परीक्षा लेने के मकसद से कर्म एवं भाग्य पर बातचीत करने का इरादा बनाया। चूंकि माधव बातूनी अधिक था। इतना ही नहीं, लफ्फाजी में भी माधव का कोई जोड़ नहीं था। शायद इसी आनन्द के लिए राघव अक्सर माधव को छेड़ दिया करता था।

राघव:- व्यक्ति की सफलता में भाग्य महत्वपूर्ण होता है या फिर उसका कर्म…?
माधव:- किसी कामयाब व्यक्ति की जीवन यात्रा का अध्ययन करें तो इसका सटीक जवाब मिल जायेगा। फिर भी यदि मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं तो बताओ… ?
राघव:- कुछ ऐसा ही समझ लो…?
माधव:- आपका बैंक में खाता तो होगा ही…!
राघव:- हां, है… बैंक मेंं खाता है… लेकिन बैंक में खाता होने से भाग्य एवं कर्म का क्या नाता…!
माधव:- नाता है… बैंक में खाता है तो बैंक में लॉकर भी होगा! चूंकि आप आर्थिक सम्पन्न व्यक्ति हैं।
राघव:- हां, बैंक में खाता भी है आैर बैंक में लॉकर भी है।
माधव:- बैंक में खाता तो आप अकेले संचालित कर लेते होगे लेेकिन लॉकर आप अकेले नहीं खोल पाएंगे।
राघव:- हां, लॉकर तो हम अकेले नहीं खोल पाएंगे।
माधव:- लॉकर खोलने के लिए आपके साथ ही बैंक मैनेजर को भी लॉकर में चाभी लगानी होगी। इसी प्रकार कामयाबी-सफलता के लिए भी भाग्य एवं कर्म दो चाभियां हैं। इनमें एक चाभी भाग्य की भगवान के पास रहती है जबकि दूसरी कर्म की चाभी व्यक्ति के पास रहती है।
राघव:- सो तो है…।

माधव:- इसलिए जब तक भाग्य एवं कर्म की चाभी एक साथ नहीं लगती, तब तक सफलता मिलना मुश्किल होता है। इसीलिए व्यक्ति को निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। पता नहीं कब भगवान भाग्य की चाभी लगा दें। अब भगवान भाग्य की चाभी लगा दें आैर व्यक्ति कर्म की चाभी न लगाये तो सफलता कैसे मिलेगी!
राघव:- आशय यह कि व्यक्ति कर्मयोगी आैर मैनेजर भगवान हैं।

माधव:- जी हां, इसलिए व्यक्ति को सदैव कर्मशील रहना चाहिए। कारण, पता नहीं भगवान भाग्य की चाभी कब लगा दें! अब भगवान कर्म की चाभी लगा दें आैर व्यक्ति कर्मशील न हो तो सफलता कैसेे मिलेगी। लिहाजा व्यक्ति को हमेशा कर्मशील रहना चाहिए। कारण कर्मशीलता के साथ ही भाग्य की चाभी लगने पर सफलता के द्वार खुलने में देर न लगती।
राघव:- निश्चय ही यह दर्शनशास्त्र भाग्य एवं कर्म की एक नई परिभाषा को गढ़ता दिखता है। इस दर्शनशास्त्र ने दिमाग को पूरी तरह जागृत कर दिया कि भाग्य तभी साथ देता है, जब पूरी ईमानदारी से परिश्रम किया जायेे। कर्मशीलता के बिना भाग्य भी साथ नहीं देता। लिहाजा भाग्य पर विश्वास करें लेकिन कर्मशीलता को नहीं छोड़ना  चाहिए।