इसलिए हर धंधे में भारी पड़ रहा हड़पू चीन

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इसलिए धंधे में भारी पड़ रहा हड़पू चीन……. सालों से व्यापार -धंधे में चीन के दबदबे की कहानी सुनते पढ़ते आए हैं। होशियार पड़ोसी कच्चा माल हमसे उठाता है और हम उसी से तैयार साज सामान आयात करके उसे कमाई कराते हैं और वो साल दर साल समृद्ध होता जा रहा है। मजे की बात तो यह है कि समय बेसमय, सोते-जागते हड़पू हवस वाला पड़ोसी हमारी छाती पर सवार होने का कोई न मौका तलाशता ही रहता है। इससे निपटने के लिए त्वरित और कारगर उत्पादन रणनीति की सख्त जरूरत है। 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का राग अलापते रहने से,और मौखिक दावों के करते रहने का ही दुष्परिणाम सामने है।

पड़ोसी देश के साथ व्यापार की स्थिति पिछले चार-पांच सालों में यह हो गई है कि हम कारोबारी असंतुलन के दलदल में डूबते गए और वो चैन की बंशी भी बजाता है और मौके बेमौके आंखें तरेरता है सो अलग। भारत चीन से आयात पर अंकुश लगाने में नाकाम रहा है। उन्नत टेक्नोलॉजी के बलबूते वृहद स्तर पर उत्पादन करने के फार्मूले पर टिकी चीन की प्रणाली बहुत एडवांस है। इसकी वजह से चीनी उत्पाद क्वालिटी के मामले में बदनाम होते हुए भी लागतक्षम होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में गदर काटते हैं। निजी क्षेत्र के एक विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर दीपांशु मोहन का कहना है _ भारत जब तक उत्पादन में जोरदार वृद्धि नहीं करेगा तब तक उत्पादन लागत को कम से कमतर कर पाना संभव नहीं होगाऔर तब तक उसे कांटे की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अपने निर्यात में लगातार अच्छी वृद्धि दर बनाए रख पाना बहुत ही कठिन है।

इधर के चार पांच वर्षों को ही लें तो चीन-भारत का द्विपक्षीय व्यापार निश्चित रूप से बढ़ा है परंतु संतुलन हमारे पक्ष में नहीं रहता है बल्कि हमारा असंतुलन बढ़ा ही है। 2022 में भारत-चीन का आपसी व्यापार अमेरिकी डॉलर में 13598 करोड़ का रहा, इसमें चीन से 11850 डॉलर का सामान निर्यात भारत को किया गया और भारत से मात्र 1748 करोड़ डॉलर का सामान चीन को निर्यात हो सका। भारत के निर्यात के मुकाबले चीन ने छः गुना अधिक निर्यात भारत को किया। दोनों पड़ोसियों के कुल 13598 करोड़ डॉलर के आपसी व्यापार में 86 प्रतिशत से अधिक भागीदारी तो चीन की रही, भारत का हिस्सा चौदह प्रतिशत से भी कम।

आंकड़े शर्मसार कर देते हैं, फिसड्डी नहीं तो क्या हैं? 2021 में द्विपक्षीय व्यापार में भारत 6938 करोड़ डॉलर के असंतुलन में था या यूं कहें कि भारत व्यापार घाटे में था। 2022 में व्यापार घाटा और चौड़ा होकर 10102 करोड़ डॉलर के स्तर पर जा पहुंचा। पिछले दो सालों से भारत चीन से सर्वाधिक आयात कर रहा है औषध निर्माण सामग्री (जैसे – ऐक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स -एपीआई), रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स व इलेक्ट्रिक सामान, मशीनरी, आटो पुर्जे, मेडिकल उपकरण,फोटो सामान, आप्टिकल्स, फर्नीचर, उर्वरक, प्लास्टिक, फुटवियर, कृत्रिम फूल, तांबा, निकिल,चर्म उत्पाद, कच्चा चमड़ा, काॅटन, घड़ियां, रेशम, छाते, लाख,रेज़िन्स का। कंदमूल, शहद सामुद्रिक खाद्य, सब्जी अंडे, डेरी उत्पाद और मछली -मांस भी काफी मात्रा में चीन से आयात होता है।

भारत ने अकेले 2022 में 470करोड़ डॉलर के लैपटॉप और 420 करोड़ डॉलर के मोनोलिथिक इंटीग्रेटेड सर्किट्स आयात किए। जबकि भारत से सूती धागे, खनिज ईंधन,-तेल, रिफांइड तांबा, लौह अयस्क, ग्रेनाइट, जोजोबा ऑयल, मानव व पशु बाल, ऊन, तंबाकू, अनाज, डीजल इंजन, कम्प्रेशर आदि का निर्यात होता है। आबादी के मामले में दोनों पड़ोसियों के बीच ज्यादा फासला नहीं है पर अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ज़मीन आसमान का अंतर है।

वाणिज्य मंत्रालय से 2022-23 के जारी ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारत का वस्तु व्यापार घाटा 40 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि के साथ 2022-23 में 26 हजार 600 करोड़ डॉलर पहुंच गया जब कि 2021-22 में 19 हजार करोड़ डॉलर हुआ था। मंत्रालय ने 2022-23 में सेवाओं के आयात-निर्यात संबंधित आंकड़े अभी नहीं जारी किए हैं। वार्षिक चीन का अंतरराष्ट्रीय व्यापार सालों से उसके पक्ष में रहा है यानी वह आयात की तुलना में निर्यात बहुत अधिक करता है, 2022 में आयात से निर्यात 88 हजार करोड़ डॉलर अधिक रहा। व्यापार के मामले में चीन के सामने भारत कहीं नहीं ठहरता। और इसीलिए चीनी मुद्रा युआन (रेनमिनबी) की स्थिति भारतीय रुपया के सापेक्ष बहुत मजबूत है। मौजूदा में 1डॉलर 6.87 युआन के और 81.68 भारतीय रुपए के बराबर है। एक युआन की कीमत 11.84 रुपए के बराबर है।

प्रणतेश बाजपेयी