लखनऊ मेरे लिए शहर नहीं, मेरा आंगन

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लखनऊ में नाटकों की पौध लगाने आैर उसे वट वृक्ष बनते देखने की चाह ने उन्हें कभी विचलित नहीं किया। यूं तो डाक्टर अनिल रस्तोगी ने पहला शौकिया नाटक मोहल्ले के एक स्कूल में 1952 में किया था। लेकिन विधिवत उन्होेंने 1964 में पूरी सजधज के साथ नाटक किया था।

साल 1962 उनके लिए सौगातों का सांताक्लाज बनकर आया। साढ़े अट्ठारह साल में बायोकैमेस्ट्री में एमएससी कम्पलीट की। दो महीने बाद शादी हो गयी आैर उसी साल सीडीआरआई में फेलोशिप भी मिल गयी। तात्कालिक मेयर की बेटी थीं सोलह साल की पत्नी। इंटर पास करते ही हल्दी रचा ली थी। आगे पढ़ना चाहती थीं। आईटी कालेज में बात की तो पता चला कि वे शादीशुदा को शिक्षा नहीं देते। फिर जोड़ जुगाड़ से नियम बदले गये, एडमीशन मिला। एक बेटे की मां बन गयीं। एंथ्रोपालिजी से डाक्टरेट किया। आैर महिला कालेज में इसी विभाग की ओपनिंग कर, हेड बन गयीं। सांताक्लाज एक बार फिर उपहार देकर चला गया।…

अनिल जी का जन्म 27 सितम्बर 1943 (दस्तावेजों में 4 अप्रैल 1943) को हुआ। बड़े भाई श्रीचंद्र किशोर रस्तोगी चाहते थे कि अनिल बड़ा आदमी बने। संयुक्त बड़ा परिवार आैर एक छोटा सा कपड़े का व्यापार। पास के रस्तोगी इंटर कालेज में नाम लिखवा दिया गया सीधे कक्षा चार में। उनके बार में एक किस्सा यह भी मशहूर है कि जब वे क्लास आठ में बोर्ड का इम्तिहान के सिलसिले में वायवा देने गये तो ‘ए” अल्फाबेट होने के नाते पहला नम्बर उन्हीं का था। बाहर आये तो ‘क्या हुआ क्या हुआ” पूछते हुए बाकी बच्चों ने घेर लिया। एक आर्ट टीचर ने देख लिया आैर अपने कक्ष में बुलाकर दो कंटाप रसीद कर दिये। गालों पर पावती छप गयी। रोते हुए बड़े भइया से शिकायत की कि मेरी बिना गलती के मुझे क्यों मारा? मैं अब उस स्कूल में कतई नहीं पढ़ंूगा। प्रिंसपल से शिकायत की गयी। प्रिंसपल ने बहुत समझाया। नतीजा निल बटा सन्नाटा। अड़ गये तो अड़ गये। भाई डर गये। नाम जुबली में लिखवा दिया गया। किस्सा एक ये भी आम ओ फहम है कि उन्हें लइया चना खाने का बेहद शौक था। एक घसीटे ऐन स्कूल जाने के वक्त लइया चना ठेला लेकर आ धमकते। उसकी भीनी भीनी खुशबू नाक में आतंक मचा देती। वो अपनी जेब में अपना कोटा फिटकर जा पहंचते स्कूल। टीचर की नजर घूमी नहीं एक फंकी मुंह की चक्की में पहुंच गयी। भरे मुंह पकड़े गये। तब निहायत दुबलेे पतले थे। टीचर ने सलाह दी कि ‘भइये लइया चना से बेहतर है कि तू दूध पी लिया कर। कुछ तो अपनी सेहत पर रहम कर।”…

सीडीआरआई में ही जाने का एक मजेदार किस्सा भी सुनते चलिए। 1961 में रूसी अंतरिक्ष यात्री यूरी गैगरीन का सीडीआरआई में स्वागत समारोह आयोजित किया गया। तात्कालिक मेयर श्री गिरिराज सरन रस्तोगी से पूर्व की पहचान थी सो प्रवेश मिल गया। वहां की लैब देखी तो विश्वविद्यालय की लैब उसके आगे दो कौड़ी की लगी। मन मचल गया कि अगर आगे रिसर्च करेंगे तो यहीं से करेंगे। कल्पनाओं में इतने मशगूल हो गये कि यूरी गैगरीन ने क्या बोला कुछ सुनायी ही नहीं दिया।…1961 में पहला नाटक ‘नूरजहां” किया। लोगों ने बहुत सराहा। शहर में उन दिनों बहुत कम ही नाटक होते। पता चलता तो देखने जरूर जाते।

1964 की बात है। सीडीआरआई में साल में राष्ट्रीय आैर अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई कांफ्रेंस होती थीं। आैर शाम को मेहमानों के मनोरंजन के लिए कल्चरल प्रोग्राम होते। अनिल जी को लगा कि संगीत के प्रोग्राम की जगह अगर नाटक दिखाया जाए तो अधिक आनन्द आयेगा। उन्होंने अपने डायरेक्टर मिस्टर केसी माथुर साहब से यह बात बतायी। उन्होंने कहा ठीक है करो तैयारी। फिर क्या था। नाटक हुआ अमीनाबाद के त्रिलोकी नाथ हाल में। नाम था ‘रक्तदान”। काफी सराहा गया।.. उसके बाद तो उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। आफिस ठीक छह बजे निकलते आैर रिहर्सल का दौर शुरू हो जाता। रात ग्यारह बजे घर में घुसते पत्नी खाने पर राह देख रही होतीं। अच्छी बात यह थी कि बोलती कुछ नहीं थीं।…. पत्नी जब ऐसी हो तो कलाकार की तो बल्ले बल्ले ही होनी थी। ‘नूरजहां”, ‘पंछी जा पंछी आ”, ‘सखाराम बाइंडर”, ‘यहूदी की लड़की”, ‘हयबदन”, ‘एक संसदीय समिति की उठक बैठक” जैसे 100 से ज्यादा नाटक के देश भर में एक हजार शोज किये। 1972 में ‘दर्पण” संस्था के सचिव बने तो 38 साल तक कुर्सी सम्भाली। ‘दर्पण” के दर्पण बन गये।… रेडियो के एक क्लास आर्टिस्ट बनकर केपी सक्सेना, शिवानी, मुद्राराक्षस, आगा हश्र कश्मीरी, अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा के लिखे नाटकों में काम किया जिसका प्रसारण नेशनल स्तर पर हुआ। नामचीन प्ले डारेक्टर राज बिसारिया, रंजीत कपूर, बावा कारंत, उर्मिल कुमार थपलियाल व सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ आदि के साथ काम कर दर्शकों से शाबाशी पायी।

1995 में जर्मनी का सांताक्लाज आया। उन्हें पत्नी के साथ जर्मनी ले गया। मेडिसिन के एक प्रोजेक्ट पर एक साल के रिसर्च वर्क के लिए रहना था लेकिन डेढ़ साल तक काम को अंजाम देकर ही लौटे। अक्सर काम में देर हो जाती तो पत्नी दो कुर्सी जोड़कर लैब में ही सो जातीं। वहां के हेड कहते ‘मिस्टर अनिल तुम जर्मनी में अपनी पत्नी को कभी घुमाने नहीं ले जाते हर समय लैब में ही परखनली को तपाते रहते हो।” उनका जवाब होता कि जिस काम के लिए भारत सरकार ने भेजा है वो पहले है सर।… दोबारा फिर जर्मनी जाना हुआ छह माह के लिए। उनके सौ के आसपास रिसर्च पेपर नेशनल आैर इंटरनेशनल जर्नल्स में प्रकाशित हुए। उनके अंडर में कई स्टूडेंट्स को पीएचडी अवार्ड हुई। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च में डाबटीज पर मोनोग्राफ पब्लिश हुआ। 2003 मेंेहेड आफ बायोकैमेस्ट्री व डायरेक्टर्स ग्रेड साइंटिस के आहदे पर रिटायर्ड हुए। स्टेज, रेडियो के बाद दूरदर्शन के एक क्लास आर्टिस बने तो लखनऊ दूरदर्शन व नेशनल डीडी वन पर ‘उड़ान”, ‘बीबी नातियों वाली”, ‘मुखड़ा क्यों देखे दर्पण में”, ‘अक्ल बड़ी या भैंस”, ‘नाच्यो बहुत गोपाल”, ‘जहां चाह वहां राह” ‘कुंती का झोला”, ‘पीली आंधी”, मंुशी प्रेमचंद की कहानियों के कई एपीसोड, ‘बेटा भाग्य से बेटी सौभाग्य से” आदि।

फिल्मों में काम करने का सिलसिला 1987 में फिल्म ‘ये वो मंजिल तो नहीं”, ‘ मैं मेरी पत्नी आैर वो”, ‘कॉफी हाउस” के बाद 2012 में आयी ‘इशकजादे” ने शोहरत की ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। फिर तो एक से बढ़कर एक फिल्मों की लाइन लग गयी। यथा ‘गुड्डू रंगीला”, ‘होटल मिलन, परमाणु, रेड, मुल्क, एक्सीडेंट प्राइम मिनिस्टर, बाटला हाउस, नक्काश, थप्पड़ के अलावा आने वाली फिल्मे हैं ‘सहर”,’भवानी”,’दीन दयाल”, ‘गालिब” आदि। फिर 2013 से 2018 तक मुम्बई प्रवास के दौरान बहुत से डेली सोप किये। आई मैजिक, कलर्स, सोनी, स्टार भारत जैसे इंटरटेंमेंट चैनल्स पर ‘न बोल तुम न मैंने कुछ कहा”, ‘कलश”, संविधान”, ‘दरीबा डायरीज” के अलावा ‘सावधान इंडिया” आैर ‘क्राइम पेट्रोल” के अनेक एपीसोड में आकर अपनी छाप छोड़ी। देश के नामचीन प्रोडेक्ट्स के कर्मिशियल्स से घर घर में पहचाने गये। केबीसी प्रोमो आैर हीरो होंडा का विज्ञापन कौन भुला सकता है भला।

1984 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, बैंक आफ बड़ौदा लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड, अवध सम्मान, यश भारती पुरस्कार से मिले ग्यारह लाख रुपये से गरीब बच्चों को शिक्षा की रोशनी से मालामाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि लखनऊ मेरे लिए एक शहर मात्र नहीं है बल्कि मेरा आंगन है।

प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव