धुरंधरों और चुनौतियों से घिरी भारतीय स्टील ‌इंडस्ट्री

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धुरंधरों और चुनौतियों से घिरी भारतीय स्टील ‌इंडस्ट्री….. भारत का इस्पात उद्योग कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन सहित कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। उद्योग को भविष्य में घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही बाजारों में अपनी स्थिति मजबूत करना जरूरी हो गया है। वैश्विक स्तर पर भारत कच्चा (क्रूड स्टील) का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। चीन उत्पादन और खपत दोनों ही में पहला नंबर चीन का है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में घरेलू इस्पात उद्योग का योगदान दो प्रतिशत के आसपास है। अंतरराष्ट्रीय फर्म डेलाॅयट ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में भारतीय इस्पात उद्योग के बारे में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया है।

रिपोर्ट में उद्योग को लागतक्षम बनाने के साथ -साथ पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान करने को कदम उठाने का सुझाव दिया गया है। भारतीय इस्पात उद्योग में उत्पादन करने में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन अपेक्षाकृत बहुत अधिक होता है। भारत में एक टन इस्पात का उत्पादन करने में लगभग 2.5 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जबकि यूरोपीय संघ में मात्र 1.8 टन। अमेरिकी इस्पात उद्योग में तो यूरोपीय संघ से भी कम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।

रिपोर्ट में भारतीय इस्पात उद्योग को डिकार्बोनाइज़ेशन पर शीघ्रातिशीघ्र कदम उठाने की जरूरत बताई गई है। एक और अहम सुझाव दिया गया है। भारत में स्टील रिसाइक्लिंग केंद्रों की संख्या और बढ़ाने की जरूरत पर फोकस करने की बात कही गई है। स्टील रिसाइक्लिंग के दो बड़े फायदे हैं। पहला यह कि लौह अयस्क (आयरन ओर) के मुकाबले रिसाइक्लिंग में ऊर्जा की खपत 72-74 प्रतिशत तक कम होती है। एक टन रिसाइकिल्ड स्टील बनाने में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 58 प्रतिशत तक कम होता है और 1.1टन लौह अयस्क की बचत होती है। इसके अलावा 500 किलो ग्राम कोयला बचत होती है।

इधर जीएसटी के सख्ती से लागू किए जाने से इस उद्योग के सामने स्थानीय स्क्रैप का संकट खड़ा हो गया है। असंगठित क्षेत्र में केंद्रित स्क्रैप का कारोबार प्रभावित हुआ है, घरेलू स्क्रैप व्यापारी जीएसटी प्रणाली को नहीं अपना पा रहे हैं नतीजतन स्क्रैप का आयात बहुत बढ़ गया है। इंडियन स्टील एसोसिएशन के जिम्मेदार सूत्रों ने बताया कि स्क्रैप आयात 2021-22 में 36लाख टन की तुलना ‌में 2022-23 में 98 लाख टन हो गया यानी साल भीतर 172 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

भारत संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और यूके से सबसे अधिक स्क्रैप आयात करता है। भारत का स्क्रैप कारोबार सालाना 88-90 हजार करोड़ रुपए का है। भारत में वर्ष 2029-30 में लौह स्क्रैप की खपत 5 करोड़ 50 लाख टन पहुंचने का अनुमान लगाया है। आने वाले दिनों में स्क्रैप की पर्याप्त उपलब्धता के‌ लिए ठोस प्रयासों की जरूरत है। ज्वाइंट प्लांट कमेटी के आंकड़ों के अनुसार देश में वर्ष 2008 से 2022 के बीच इस्पात की मांग में 80 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2021-22 में क्रूड स्टील का उत्पादन 13.35 करोड़ टन और फिनिश्ड स्टील का उत्पादन 12 करोड़ टन हुआ। फिनिश्ड स्टील का आयात भी 2020-21 में 39.4 लाख टन से बढ़कर 2021-22 में 47.70 लाख टन दर्ज किया गया।

एसोसिएशन के सेक्रेटरी जनरल आलोक सहाय के अनुसार सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस होने से स्टील की बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए 2030-31 तक सालाना उत्पादन स्तर 30 करोड़ टन हासिल करने की योजना पर उद्योग की प्रमुख कंपनियां अभी से प्रयासरत हैं। इस उद्योग में प्रत्यक्ष रूप से छः लाख लोगों को और अप्रत्यक्ष रूप से बीस लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। उद्योग के प्रमुख खिलाड़ियों में टाटा स्टील 2025 तक 12 हजार करोड़ रुपए, जेएसडब्ल्यू जम्मू-कश्मीर में 15 हजार करोड़ रुपए तथा विजयनगर संयंत्र के विस्तार व उड़ीसा में खनन परियोजना पर 47 हजार करोड़ रुपए का निवेश कर रही है।आर्सेलर मित्तल अगले दस वर्षों में एक लाख करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी निवेश परियोजना पर काम कर रहे हैं।

जाहिर है उद्योग को 2030-31को लक्ष्य में रखते हुए कच्चे माल की सुगम- लागतक्षम उपलब्धता से लेकर पर्यावरण अनुकूल टेक्नोलॉजी की मदद से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ाने की ठोस रणनीति बनाकर उसपर चलने का समय आ गया है। अंतरराष्ट्रीय इस्पात बाजार में पांच -छ: बड़े खिलाड़ी देश हैं जो भारत से हर मामले में बहुत आगे हैं। विश्व का सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक- आयातक – निर्यातक चीन है, विश्व की टाॅप दस कंपनियों में से छः कंपनियां चीन की हैं।

चीन की क्षमता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वह सालाना सात करोड़ टन इस्पात का निर्यात करता है और सालाना 23 करोड़ टन स्क्रैप की खपत करने वाला देश भी चीन ही है। निर्यात के मामले में जापान दूसरे पायदान पर, रूस तीसरे पर, दक्षिण कोरिया चौथे पर और जर्मनी पांचवें स्थान पर आता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन धुरंधरों से भारतीय इस्पात उद्योग को मुकाबला करना है जो कतई आसान नहीं है।

प्रणतेश बाजपेयी