पीडीए का आपरेशन सपाइयों का टेंशन !

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, विपक्ष विशेषकर सपा की चिंता बढ़ती जा रही है। पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव परिणामों ने जहां अखिलेश यादव और पार्टी की चिंता बढ़ा रखी है, वहीं असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री ने भी उनकी नींद उड़ा दी है। उस पर कोढ़ में खाज ये है कि भाजपा ने अखिलेश के पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण यानी पीडीए का भी ऑपरेशन कर डाला है। इस समीकरण के तीनों सेगमेंट में भाजपा ने घुसपैठ कर रखी है, और पीडीए समीकरण को भोथरा करने की पूरी तैयारी कर ली है। यानी अभी तक के समीकरणों में समाजवादी पार्टी बीस नहीं दिखाई पड़ रही है। वैसे चुनाव की तारीखें आते-आते ये समीकरण बदल भी सकते हैं।

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, विपक्ष विशेषकर सपा की चिंता बढ़ती जा रही है। पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव परिणामों ने जहां अखिलेश यादव और पार्टी की चिंता बढ़ा रखी है, वहीं असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री ने भी उनकी नींद उड़ा दी है। उस पर कोढ़ में खाज ये है कि भाजपा ने अखिलेश के पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण यानी पीडीए का भी ऑपरेशन कर डाला है। इस समीकरण के तीनों सेगमेंट में भाजपा ने घुसपैठ कर रखी है, और पीडीए समीकरण को भोथरा करने की पूरी तैयारी कर ली है। यानी अभी तक के समीकरणों में समाजवादी पार्टी बीस नहीं दिखाई पड़ रही है। वैसे चुनाव की तारीखें आते-आते ये समीकरण बदल भी सकते हैं।

* पीडीए के पिछड़ा, दलित व अल्पसंख्यक समीकरण में सेंध
* ओवैसी की एंट्री ने भी बढ़ाई समाजवादी पार्टी की धड़कन
* पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम पहले ही बढ़ा चुके हैं चिंता

भारतीय राजनीति में इस समय चुनाव न तो मुद्दों पर लड़े जा रहे हैं, और न ही काम की बुनियाद पर। चुनाव में इस समय एक ही नारा चल रहा है, वह है धर्म और जाति का। या सीधे-सीधे ये कहें कि वोटिंग पैटर्न दो ध्रुवीय राजनीति पर आकर टिक गया है। अब सीधे-सीधे हिंदू मुस्लिम की राजनीति प्रभावी हो गई है। पश्चिम बंगाल के परिणाम इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। यही कारण है कि 30% से अधिक मुस्लिम वोटर वाले राज्य पश्चिम बंगाल में भी भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। और उसी बहुमत का नतीजा है कि राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी रही टीएमसी में भगदड़ मची है। पश्चिम बंगाल से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में टीएमसी खंड-खंड हो गई है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक पंडितों को भी लगता है कि अगर कहीं पश्चिम बंगाल का वोटिंग ट्रेंड यूपी में भी दोहरा दिया गया, और लड़ाई दो ध्रुवीय हो गई तो कई पार्टियों को मुंह की खानी पड़ सकती है। वैसे भी अब हैदराबादी भाईजान यूपी में सक्रिय हो गए हैं। इससे सपा के सपनों पर पानी फिर सकता है।

उधर 2024 के आम चुनावों में झटका खाने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपने को संभाला है, अपनी रणनीति में बदलाव किया है। इसीलिए उसके बाद के लगभग सभी विधानसभा चुनावों में भाजपा ने सफलताएं हासिल की है। यही कारण है कि इस समय उसकी 22 से अधिक राज्यों में अपनी या गठबंधन साथियों के साथ सरकारें हैं। ऐसा लगता है कि विपक्ष के फेक नेगेटिव के चलते भाजपा को 2024 में कमजोर बनाने वाली जनता अब अपनी गलती सुधार रही है। उसके बाद हुए लगभग सभी चुनाव भाजपा या एनडीए के पक्ष में गए हैं। अपवाद सिर्फ केरल और तमिलनाडु हैं। उसी क्रम में अब भाजपा ने उत्तर प्रदेश में भी ध्यान लगाना और अखिलेश के पीडीए समीकरण में सेंध लगना शुरू कर दिया है।

भाजपा ने सबसे पहले पीडीए के पी यानी पिछड़ा वर्ग का पोस्टमार्टम किया है। इसमें भाजपा ने यादवों के मुकाबले अन्य ओबीसी जातियों को साधना शुरू कर दिया है। इसीलिए योगी सरकार में सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर, निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद और अपना दल प्रमुख अनुप्रिया पटेल और रालोद के जयंत चौधरी की पूछ बढ़ी हुई है। इन सभी को स्पेशल ट्रीटमेंट मिल रहा है। वैसे सोशल मीडिया पर गौर करें तो अब यादवों ने भी खुद को सनातन से जोड़ना शुरू कर दिया है, जो भाजपा के पक्ष में ही माना गया है। अब बात डी यानी दलित समीकरण की। इस समीकरण में भाजपा का ध्यान जाटवों के अलावा अन्य दलित जातियों पर है। इसीलिए भाजपा ने लखनऊ में राजा कंसा पासी किले के बहाने छह-सात फीसदी पासी वोटरों को लुभाना शुरू कर दिया है। पार्टी ने इस काम में लाखन आर्मी के नेता सूरज पासी को लगा दिया है, जो माहौल बनाने में लगे हुए हैं। इसके बाद बात करते हैं पीडीए के ए यानी अल्पसंख्यक समीकरण की।

इसमें भाजपा अभी तक कोई मजबूत पकड़ नहीं बना पाई है। पर इसमें भाजपा की मदद उसकी बी टीम कहे जा रहे, हैदराबादी भाईजान कर रहे हैं। 14 जून को बहराइच से यूपी की सियासत में असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री का सीधा मतलब है, मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण। और अगर ये ध्रुवीकरण हो गया तो भाजपा को ही फायदा होगा। भाजपा की कुछ ऐसी ही मदद पश्चिम बंगाल में हुमायूं कबीर ने भी टीएमसी को चोट देकर की है। वैसे भी राजनीतिक पंडित कह रहे हैं कि यदि 30 फीसदी से अधिक मुसलमान वोटरों वाले राज्य पश्चिम बंगाल में भाजपा जीत गयी है, तो यूपी में तो मात्र 20 फीसदी मुसलमान ही हैं। यानी पीडीए समीकरण का पूरा आपरेशन।

इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव के पीडीए के सामने गरीब, किसान, महिला, युवा यानी जीकेएमवाई समीकरण बनाया है। इसकी घोषणा उन्होंने पिछले दिनों एसिड अटैक पीड़िताओं के लिए मुफ्त मकान और इलाज योजना की शुरुआत करते हुए की है। इस मौके पर उन्होंने इस समीकरण के लिए किए गए कार्यों पर भी प्रकाश डाला। यह समीकरण योगी के हिंदुत्व के करीब भी है और सभी हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करता है। जबकि अखिलेश यादव के समीकरण से सवर्ण गायब हैं। उधर सीएम योगी के समीकरण में मुसलमान भी समाहित हैं, क्योंकि इसमें सबके विकास की बात की गई है। सोशल मीडिया में भी योगी के पक्ष में कुछ मुसलमान माहौल बनाते दिख रहे हैं।

हालांकि यूजीसी के मुद्दे पर सवर्णों की नाराजगी भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है, लेकिन उसका लाभ सपा को मिलेगा, इसमें संदेह है। क्योंकि उनके पीडीए में सवर्णों के लिए जगह ही नहीं दिख रही है। पर इस समय अखिलेश यादव का ब्राह्मणों के प्रति प्रेम कुछ ज्यादा दिख रहा है। और आजकल तो सनातन के प्रति भी उनकी आवाज थोड़ी मीठी हुई है। पर ये कितना कारगर होगा ये तो चुनाव परिणाम ही बता पाएंगे। फिलहाल पीडीए समीकरण की काट तैयार करने में भाजपा लग गई है। असदुद्दीन ओवैसी तो उसकी मदद में लगे ही हैं।

अभयानंद शुक्ल