लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी ने 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक और चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। मायावती ने लखनऊ में समीक्षा बैठक की। बैठक में सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों के पार्टी प्रभारी, जिलाध्यक्ष और प्रादेशिक स्तर के नेता मौजूद रहे। पार्टी सूत्रों के अनुसार बैठक में नेताओं से कहा गया कि 2027 का विधानसभा चुनाव पूरी गंभीरता से लड़ना है और सरकार भी बनानी है। इस संदर्भ में पार्टी जनों को निर्देश दिए गए हैं कि इस बार फिर सोशल इंजीनियरिंग का वह फार्मूला दोहराना है, जिसके बूते हमने सरकार बनाई थी। ऐसे में किसी भी स्थिति में ब्राह्मण और मुस्लिम समुदाय को नाराज नहीं करना है।
*बसपाइयों को ब्राह्मणों पर डोरे डालने के निर्देश
* बसपा की समीक्षा बैठक में चुनावी तैयारियां तेज करने के भी निर्देश
* मुस्लिम समुदाय को फिर विश्वास में लेने के लिए भी कहा गया
* बसपा फिर दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम गठजोड़ की कोशिश में
पार्टी की इस बैठक में कहा गया कि यूपी में ब्राह्मणों की भाजपा से नाराजगी हमारे लिए शुभ संकेत है। कहा गया कि ब्राह्मण वर्ग को भाजपा में कुछ नहीं मिला और वे विकल्प की तलाश में हैं। बैठक में इस बात पर जोर रहा कि यदि ब्राह्मणों का झुकाव बसपा की ओर हो गया तो मुसलमान भी पार्टी से जुड़ जाएंगे। पार्टी नेताओं का कहना था कि दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम समीकरण से एक बार फिर बसपा अपनी प्रतिष्ठा वापस पा सकती है। सूत्रों के अनुसार पार्टी सुप्रीमो मायावती ने कहा कि एसआईआर की वजह से पार्टी के काम प्रभावित हुए हैं। इसलिए अब संगठन को मजबूत कर अपने-अपने क्षेत्र में काम तेज करने का समय आ गया है। मायावती ने कहा कि विरोधी पार्टियों द्वारा बीएसपी को कमजोर करने के लिए रचे जा रहे षड्यंत्रों को भी बेअसर करना होगा। बैठक में मायावती ने कहा कि पूर्व की सरकारों ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि मुस्लिमों व अल्पसंख्यकों की हालात दयनीय हो गई है। हमें इस बारे में भी मुसलमानों को जागरूक करने की जरूरत है।
इस बाबत जानकारों का कहना है कि इसी सोच के चलते ही मायावती ने पहले से ही ब्राह्मण समुदाय के लिए आवाज उठानी शुरू कर दी है। विधानसभा के शीत सत्र के दौरान ब्राह्मण विधायकों की सहभोज का मसला हो, यूजीसी के नए रेगुलेशन का विवाद हो या फिर घूसखोर पंडत नामक ओटीटी फिल्म के विरोध की बात हो, हर बार मायावती ने सीधे तौर पर सवर्णों विशेषकर ब्राह्मण समाज का पक्ष लिया है। अब सोशल मीडिया में भी इस बात की चर्चा हो रही है कि भाजपा से नाराज ब्राह्मण एक बार फिर मायावती पर भरोसा कर सकता है। गाहे-बगाहे यह बात भी उठती रहती है कि कानून व्यवस्था के मामले में मायावती का शासन तुलनात्मक रूप से बेहतर था। इसके अलावा ब्राह्मण अखिलेश यादव की तुलना में मायावती के शासन में बहुत कंफर्टेबल फील करते हैं। बस ब्राह्मणों की झिझक सिर्फ दलित उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग को लेकर है। ऐसे में अगर मायावती इस बारे में कोई ठोस आश्वासन देने में सफल हो गयीं तो ब्राह्मण इस समय अच्छे विकल्प की तलाश में बैठा है।
दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम भाईचारा ने किया कमाल : बसपा प्रमुख मायावती 13 मई 2007 को चौथी बार यूपी की मुख्यमंत्री बनीं थीं। उस बार के चुनावों में बसपा की ऐतिहासिक पूर्ण बहुमत (403 में से 206 सीटें) की जीत के बाद उन्होंने अपने चौथे कार्यकाल की शुरुआत की थी। इस जीत में दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम समीकरण का बहुत बड़ा हाथ रहा। बसपा प्रमुख के विश्वासपात्र और पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की इस समीकरण को बनाने में बड़ी भूमिका थी। चुनाव के पूर्व बनी भाईचारा कमेटियों ने कमाल कर दिया था। बसपा प्रमुख इससे पहले 1995, 1997 और 2002 में भी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुकी थीं।
अभयानंद शुक्ल
कार्यकारी संपादक

