यूजीसी और केजरीवाल-संयोग है या प्रयोग

कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी अचानक या बिना सोच-विचार के नहीं होता है। सब कुछ पहले से एक तय पटकथा के तहत सामने आता है। ऐसा ही कुछ यूजीसी रेगुलेशन और केजरीवाल के मामले में दिखाई दे रहा है। दोनों ही मामलों के घटनाक्रमों पर गौर करें तो वे टेस्ट केस की तरह लगते हैं। यूजीसी में अगर सवर्णों का तापमान नापा गया है तो केजरीवाल के मामले में कांग्रेस को फंसाने की कथित कोशिश की गई है

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लखनऊ। कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी अचानक या बिना सोच-विचार के नहीं होता है। सब कुछ पहले से एक तय पटकथा के तहत सामने आता है। ऐसा ही कुछ यूजीसी रेगुलेशन और केजरीवाल के मामले में दिखाई दे रहा है। दोनों ही मामलों के घटनाक्रमों पर गौर करें तो वे टेस्ट केस की तरह लगते हैं। यूजीसी में अगर सवर्णों का तापमान नापा गया है तो केजरीवाल के मामले में कांग्रेस को फंसाने की कथित कोशिश की गई है। हालांकि दोनों ही मामले अभी फाइनल नहीं हैं। इसके अलावा इन फैसलों से एक नैरेटिव भी बन गया है कि हमारी न्यायपालिका निष्पक्ष है।

* यूजीसी रेगुलेशन लाकर और शीर्ष कोर्ट के आदेश से स्थगित करा सवर्णों का मापा गया है तापमान
* केजरीवाल को शराब घोटाले में आरोपी बनाया और कोर्ट से कथित राहत दिला कांग्रेस को फंसाया
* दोनों मामले मोदी सरकार का एक प्रयोग हैं, जिनके रिजल्ट अब धीरे-धीरे आ रहे हैं सबके सामने

यूजीसी रेगुलेशन लागू करना और उसके बाद उस पर सुप्रीम कोर्ट की तत्काल रोक तथा केजरीवाल पर शराब घोटाले का आरोप लगना और लोअर कोर्ट द्वारा उन्हें बरी करना किसी पूर्व लिखित पटकथा का हिस्सा प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है कि दोनों मामले दबाव बनाने की रणनीति के तहत लाए गए हों। बताते हैं कि सवर्ण कितना रिएक्ट कर सकते हैं, यह देखने के लिए यूजीसी रेगुलेशन लाया गया है, और अरविंद केजरीवाल कितना विरोध कर सकते हैं, यह देखने के लिए उनके खिलाफ शराब घोटाले का मामला लाया और कथित तौर पर खत्म किया गया। और दोनों ही मामलों में जिस तरह से कोर्ट ने हस्तक्षेप कर मामले डाइल्यूट किए हैं, उससे तो यही लगता है कि दोनों ही मामलों में मोदी सरकार की कोई रणनीति काम कर रही है।

बात पहले यूजीसी रेगुलेशन की। इस रेगुलेशन को लाकर सवर्णों का तापमान जानने की कोशिश और पिछड़ों को खुश करने का प्रयास किया गया है। फिर जनहित याचिका के जरिए उसे रोककर अब उसके सियासी नफा-नुकसान पर मंथन चल रहा है। वैसे एक चर्चा यह भी है कि यूजीसी रेगुलेशन यूपी के सीएम योगी को घेरने के लिए लाया गया है। सूत्रों का कहना है कि इसके जरिए मोदी सरकार ये देखना चाहती है कि क्या सवर्णों की नाराजगी के बाद भी योगी विधानसभा का चुनाव जीत सकते हैं। यदि हां तो ये माना जाएगा कि पिछड़े भाजपा के साथ हैं, और सवर्णों की नाराजगी का कोई असर नहीं है। और ऐसे में पिछड़ों को और करीब लाने के लिए लोकसभा चुनाव के पहले ही यूजीसी रेगुलेशन को अंतिम तौर भी पर लाया जा सकता है। और यदि यूपी में हार हुई तो फिर योगी नामक कांटे का खात्मा। यानी कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना।

सूत्रों का कहना है कि इसी प्रकार केजरीवाल के मामले में भी भाजपा ने गेम खेला है। इडी और सीबीआई लगाकर कानून के शिकंजे में लाए गए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत सभी आरोपितों को कथित तौर पर लोअर कोर्ट से राहत दिलाकर ये देखने की कोशिश है कि राहत मिलने पर केजरीवाल और कांग्रेस का क्या रिएक्शन होगा। और ये दांव कारगर साबित हुआ। दिख गया है कि कांग्रेस ने केजरीवाल को निशाने पर लिया तो केजरीवाल भी फायर हो गये। और फिर तापमान पता चलते ही लोअर कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील भी हो गई। और जैसा कि अक्सर होता है कि लोअर कोर्ट के आदेश पर हाईकोर्ट की रोक और केस फिर चालू। अंदाजा है कि इस मामले में भी यही हो सकता है। जैसा कि अभी केरला स्टोरी पार्ट दो के मामले में हुआ है। पहले हाईकोर्ट की सिंगल बेंच रिलीज पर रोक लगाती है और फिर हाईकोर्ट की ही डबल बेंच रोक हटा देती है।

ऐसे में अब यूजीसी रेगुलेशन का क्या होगा, ये तो यूपी विधानसभा का परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन केजरीवाल के मामले का सुखद परिणाम तो आ ही गया। केजरीवाल को राजनीतिक संजीवनी मिल गई है, ताकि वे गुजरात और पंजाब में सक्रिय होकर कांग्रेस का खेल बिगाड़ें और भाजपा को फायदा मिल सके। यानी यहां भी एक पंथ दो काज। जैसा कि सभी जानते हैं कि गुजरात और पंजाब में कांग्रेस एक बड़ा स्टेक होल्डर है। इसीलिए केजरीवाल को पिंजरे से बाहर निकाला गया है। शायद इसीलिए कांग्रेस भी आरोप लगा रही है कि ये केजरीवाल और भाजपा की मिलीभगत है, क्योंकि पंजाब और गुजरात में केजरीवाल के आ जाने से लड़ाई त्रिकोणीय होगी। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा भी आरोप लगाते हैं कि इसीलिए केजरीवाल को भाजपा की वाशिंग मशीन में धो-पोंछ कर बाहर निकाल दिया गया है, ताकि वे चुनावी लड़ाई को प्रभावित कर सकें। खेड़ा इसे भाजपा-आप का खेल बता रहे हैं। अब कांग्रेस को जवाब देते हुए अरविंद केजरीवाल का कहना है कि मैं तो ये कहता हूं कि कांग्रेस और बीजेपी मिली हुई हैं। अगर ऐसा नहीं है तो सोनिया, राहुल और राबर्ट वाड्रा अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं किए गए, क्यों सिर्फ अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह ही गिरफ्तार किए गए। यानी उनके निशाने पर कांग्रेस अधिक और भाजपा कम है। अब सच्चाई क्या है, ये तो आने वाला समय बताएगा, पर भाजपाइयों का कांफिडेंस इस कहानी की चुगली तो कर ही रहा है।

अभयानंद शुक्ल
कार्यकारी सम्पादक