राहुल तो चतुर राजनीतिक खिलाड़ी निकले भाई

राजनीतिक चश्मे से देखें तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बड़े खिलाड़ी निकले। सियासी पंडित चाहें जो कहें, पर राहुल की राजनीतिक परिपक्वता को अब मान ही लेना चाहिए। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव-प्रचार के दौरान वे पानी पी-पीकर ममता बनर्जी और उनके निजाम को कोस रहे थे, और अब उसी ममता के सियासी घावों पर मरहम लगा रहे हैं। उन्होंने तो कांग्रेस के लोगों से ये तक कहा है कि ममता की हार पर खुश होने की जरूरत नहीं है। ममता बनर्जी की भी मजबूरी देखिए कि वे अब ये कहने पर मजबूर हो गई हैं कि उनके साथ सोनिया गांधी हैं, राहुल गांधी हैं और पूरा इंडी अलायंस है। यानी कि राजनीति में कोई भी न तो स्थाई दोस्त होता है न स्थाई दुश्मन होता है, वाली कहावत यहां फिट बैठ रही है।

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लखनऊ। राजनीतिक चश्मे से देखें तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बड़े खिलाड़ी निकले। सियासी पंडित चाहें जो कहें, पर राहुल की राजनीतिक परिपक्वता को अब मान ही लेना चाहिए। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव-प्रचार के दौरान वे पानी पी-पीकर ममता बनर्जी और उनके निजाम को कोस रहे थे, और अब उसी ममता के सियासी घावों पर मरहम लगा रहे हैं। उन्होंने तो कांग्रेस के लोगों से ये तक कहा है कि ममता की हार पर खुश होने की जरूरत नहीं है। ममता बनर्जी की भी मजबूरी देखिए कि वे अब ये कहने पर मजबूर हो गई हैं कि उनके साथ सोनिया गांधी हैं, राहुल गांधी हैं और पूरा इंडी अलायंस है। यानी कि राजनीति में कोई भी न तो स्थाई दोस्त होता है न स्थाई दुश्मन होता है, वाली कहावत यहां फिट बैठ रही है।

* चुनाव प्रचार में ममता की बखिया उधेड़ी और अब साथ होने का दिया आश्वासन
* टीएमसी नेता भी मजबूरी में कह रहीं हैं कि वे इंडी अलायंस में ही रहेंगी
* विपक्ष की एकता का फेविकोल ये सूत्र है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है

अब हालत ये है कि राहुल गांधी ने ममता बनर्जी को इस मुकाम पर पहुंचा दिया है कि वे चाह कर भी राहुल की बुराई नहीं कर पाएंगी। हालांकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान टीएमसी के खिलाफ जोरदार प्रचार कर राहुल गांधी ने उनका खेल बिगाड़ा है। वैसे इस चुनाव की एक सच्चाई ये भी है कि जो मुसलमान ममता बनर्जी से नाराज था उसे कांग्रेस ने विकल्प प्रदान किया। और इसी के चलते मुस्लिम वोट बैंक का बंटवारा हुआ। यानी ममता की दुर्गति के लिए जितनी दोषी भाजपा है, उतनी ही कांग्रेस भी है। पर राजनीतिक मजबूरी देखिए कि वे राहुल गांधी का विरोध नहीं कर पा रही हैं। और इसे ही कहते हैं कि जबरा मारे और रोवै न दे। वैसे विपक्ष की इस एकता में दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, वाली नीति भी काम कर रही है। इसीलिए शायद राहुल गांधी की भी भाषा अब बदल गई है। नेता प्रतिपक्ष अब ममता बनर्जी के बचाव में आ गए हैं, और उन्हीं की भाषा बोलने लगे हैं। वे भी कहने लगे हैं कि पश्चिम बंगाल में वोट चोरी हुई है, सौ सीटों की चोरी कर ली गई है। और यह चोरी भाजपा ने चुनाव आयोग के साथ मिलकर की है। उधर अब तक कांग्रेस को अपने ठेंगे पर रखने वाली ममता की भी भाषा बदली है। वे कहने लगी हैं कि अब इंडी अलायंस के साथ रहेंगी। और अब तो वे बड़े फख्र के कह रही हैं कि उनके साथ सोनिया जी हैं, राहुल जी हैं, केजरीवाल जी हैं, अखिलेश जी हैं, तेजस्वी यादव जी हैं, हेमंत सोरेन जी हैं और स्टालिन जी हैं। मतलब राजनीति में जो एक जुमला कहा जाता है कि इसमें न कोई स्थाई दोस्त होता है न दुश्मन होता है, उसे ये विपक्षी पार्टियां चरितार्थ करती दिख रही हैं।

इस अपनापे में ममता बनर्जी को जो सच्चाई नहीं दिख रही है, वो यह है कि राहुल गांधी बड़ी सफाई से अपना काम कर गये। उन्हें टीएमसी को पश्चिम बंगाल से उखाड़ना था, और ये काम उन्होंने भाजपा की मदद से कर दिया। यानी अब उन्होंने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के लिए स्पेस तैयार कर लिया है। यही काम उन्होंने असम में बदरूद्दीन अजमल को दो सीटों पर सिमटा कर किया। खबर है कि असम में कांग्रेस के 19 विधायक जीते हैं, जिनमें से 18 मुसलमान हैं। यानी मैसेज ये गया कि वहां मुस्लिमों के एकमात्र नेता राहुल गांधी हैं। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा के खिलाफ मुसलमानों को कांग्रेस के रूप में अब एक राष्ट्रीय पार्टी वाला विकल्प मिल गया है। बीते चुनाव में पश्चिम बंगाल में ये ट्रेंड दिखा कि जो मुस्लिम टीएमसी से नाराज था, उसने कांग्रेस को वोट दिया। असम में भी मुस्लिमों ने यही काम बदरूद्दीन अजमल के साथ किया। अजमल से नाराज मुस्लिमों ने कांग्रेस का साथ दिया। यानी राहुल गांधी अपनी चुनावी रणनीति में सफल हो गए।

राहुल गांधी को ममता बनर्जी की हार का फायदा सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही नहीं मिला है, बल्कि उसका असर यूपी पर भी पड़ने वाला है। पश्चिम बंगाल चुनाव में हिंदू मतों के ध्रुवीकरण से सपा भी परेशान है। पार्टी को इस बात की चिंता सता रही है कि यदि यूपी में भी ऐसा कुछ हो गया तो इस बार भी सत्ता पाने की उम्मीद क्षीण हो जाएगी। ऐसे में खबर है कि बात-बात में कांग्रेस को घुड़की देने वाले अखिलेश की टोन भी बदली है। क्योंकि भाजपा से मुकाबले के लिए उन्हें कांग्रेस से अच्छा साथी नहीं मिलेगा। ऐसे में कांग्रेस की बार्गेनिंग पावर बढ़ सकती है। यानी राहुल ने एक ही तीर से ममता बनर्जी और अखिलेश यादव दोनों पर निशाना लगाया है। बात यहीं तक नहीं है। खबर है कि तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके को छोड़ अभिनेता से राजनेता बने विजय के साथ जाने वाली है। इससे नाराज़ डीएमके वाले कांग्रेस को गद्दार कह रहे हैं। शायद राहुल गांधी को कोई काबिल सलाहकार मिल गया है।

अभयानंद शुक्ल
कार्यकारी सम्पादक