लखनऊ। यूपी बीजेपी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। शंकराचार्य विवाद को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या व बृजेश पाठक के विरोधी बयानों ने इस नई आशंका को जन्म दिया है। इसके अलावा संघ प्रमुख मोहन भागवत की हालिया लखनऊ यात्रा के दौरान डिप्टी सीएम बृजेश पाठक द्वारा योगी की लाइन से हटकर बटुकों का सम्मान और शंकराचार्य तथा बटुकों की कथित पिटाई की निंदा भी नए सियासी समीकरणों का संकेत बताया जाता है। साथ ही दोनों डिप्टी सीएम और मुख्यमंत्री योगी से संघ प्रमुख की अलग-अलग मुलाकातें भी कुछ चर्चाओं को बल दे रही हैं।
* शंकराचार्य विवाद पर मुख्यमंत्री योगी और दोनों डिप्टी सीएम का अलग-अलग स्टैंड किसी नए समीकरण का कर रहा इशारा
* ब्रजेश पाठक के बयान की टाइमिंग भी चिंता जनक, संघ प्रमुख की लखनऊ यात्रा के दौरान सीएम से अलग विचार भी काबिले गौर
* मोहन भागवत से योगी आदित्यनाथ और दोनों डिप्टी मुख्यमंत्रियों की अलग-अलग मुलाकातें भी सियासी चर्चाओं का बनी हुई हैं कारण
पिछले दिनों प्रयागराज के संगम मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के कथित अपमान का मामला अब गरमाता जा रहा है। अब योगी आदित्यनाथ और शंकराचार्य ने इसे अपने स्वाभिमान से जोड़ रखा है। दोनों ही अपने-अपने स्टैंड पर कायम हैं। तल्खी यहां तक बढ़ गई है कि शंकराचार्य ने सीएम से योगी होने का सबूत मांग लिया है। सीएम योगी ने भी विधानसभा में बोलते हुए कह दिया है कि हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं हो सकता। इसके पहले माघ मेले में ही मेला प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से उनके शंकराचार्य होने का प्रमाण मांग लिया था। यानी योगी का स्टैंड तो क्लियर है। ऐसे में दोनों डिप्टी सीएम का इस मामले में योगी विरोधी स्टैंड काबिले गौर है। वैसे योगी के बयान के बाद शंकराचार्य भी नहीं रुके, उन्होंने भी पलटवार करते हुए कहा कि भगवा पहन लेने से कोई योगी नहीं हो जाता। तल्खी अब बहुत ही बढ़ गई है। इस कदर कि शंकराचार्य ने तो मार्च महीने में 10-12 तारीख के बीच संत सम्मेलन बुलाकर योगी के हिंदू बने रहने या न होने के बारे में फैसला लेने का भी ऐलान कर दिया है। उन्होंने योगी के हिंदू बने रहने के लिए बाकायदा एक शर्त रख दी है। और वह शर्त यह है कि योगी यूपी में गौ हत्या और गोमांस का व्यापार रोक कर साबित करें कि वे सच्चे हिंदू हैं। और अगर वे ऐसा नहीं कर पाए तो उन्हें संतों की सभा में कालनेमि घोषित कर दिया जाएगा।
इस विवाद की शुरुआत में जब शंकराचार्य और उनके शिष्यों का कथित अपमान हुआ तो रुष्ट शंकराचार्य ने अपने शिविर के सामने ही धरना दे दिया और माफी की मांग कर दी। उस दौरान डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने योगी की लाइन के खिलाफ एक बयान दिया। उन्होंने कहा था कि मैं शंकराचार्य भगवान से प्रार्थना करता हूं कि वे अपना धरना छोड़ें और स्नान कर विवाद का अंत करें, दोषियों को जांच के बाद दंडित भी किया जाएगा। उन्होंने ये भी कहा था कि मैं शंकराचार्य जी से मिलने भी जाऊंगा। हालांकि बाद में पता चला कि केशव मौर्य को ‘ऊपर’ से मना कर दिया गया था जिसके चलते वे नहीं गए। इस पर शंकराचार्य ने चुटकी ली थी और कहा था कि एक डिप्टी सीएम ठीक-ठाक था, मुख्यमंत्री बनने लायक था, लेकिन उसको भी लोगों ने रोक दिया।
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बाद अब दूसरे डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने भी बड़ा बयान दे दिया है। उन्होंने बृहस्पतिवार 19 फरवरी को लखनऊ में अपने आवास पर बटुकों का सम्मान किया और कहा कि माघ मेला में बटुकों का पिटाई और उनकी शिखा खींचना महापाप है, और इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। इसे कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता। अब बृजेश पाठक के बयान के बाद सियासी हल्कों में तूफान मचा हुआ है। लोग इसकी टाइमिंग को लेकर सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि इस समय संघ प्रमुख मोहन भागवत राजधानी लखनऊ में हैं। ऐसे मौके पर बृजेश पाठक का यह बयान इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वे भी योगी के खिलाफ लाइन लेते जा रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि शायद वे कोई और रास्ता तलाश रहे हैं। वैसे कुछ जानकार इसे हाई कमान का इशारा बता रहे हैं। क्योंकि बिना किसी शह के दोनों डिप्टी सीएम अपने सीएम के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं कर सकते।
अब राजनीतिक विश्लेषक भी इसमें कुछ नये एंगल की तलाश में हैं। उनको आशंका है कि यह योगी आदित्यनाथ को डैमेज करने की एक चाल है। इसी कारण संघ प्रमुख मोहन भागवत के सामने यह मैसेज पहुंचाने की कोशिश है कि प्रदेश का मंत्रिपरिषद योगी के काम से संतुष्ट नहीं है। इसके अलावा राजनीतिक विश्लेषण इस बात की भी चर्चा कर रहे हैं कि मोहन भागवत से योगी और दोनों डिप्टी सीएम अलग-अलग क्यों मिले। उल्लेखनीय है कि बीते बुधवार 18 फरवरी को मुख्यमंत्री ने संघ प्रमुख से अकेले में लगभग 45 मिनट वार्ता की थी। और उसके बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने भी मुलाकात की थी। अब इन अलग-अलग मुलाकातों को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है। हालांकि भाजपा का कोई जिम्मेदार इस बारे में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं। ऐसे में लगता यही है कि कहीं न कहीं कोई खिचड़ी पक रही है, जो आने वाले समय में एक बड़े निर्णय के रूप में आ सकती है।
कुछ जानकार इसे यूजीसी विवाद से हुए डैमेज को कंट्रोल करने की कवायद के रूप में भी देख रहे हैं। उनका कहना है कि यूजीसी विवाद से सवर्ण बहुत नाराज हैं, और अब भाजपा पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। ऐसे में कोशिश यही है कि किसी भी तरह लोगों का माइंड डाइवर्ट किया जाए और उनको हिंदुत्व की ओर धकेला जाए। संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयानों में भी सिर्फ हिंदुत्व का ही जोर दिखा। ऐसे में आने वाले समय में क्या होगा ये तो भाजपा जाने परंतु इस बात के संकेत तो मिल ही रहे हैं कि यूपी बीजेपी और यूपी सरकार में सब कुछ सामान्य नहीं है।
अभयानंद शुक्ल
कार्यकारी सम्पादक


