व्यक्तित्व का अलंकरण है विचार शक्ति

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विचार शक्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब होती है, मनुष्य जीवन में कर्म के लिए विचारों का होना अति-आवश्यक होता है अर्थात् विचार के बिना कर्म अस्तित्व विहीन होता है अथवा यह भीे कहा जा सकता है। मनुष्य की विचार शक्ति उसके कर्म की सीढ़ी का पहला पायदान होती है। मनुष्य का मन विचारों का उद्गम स्थल होता है तथा कोई भी मनुष्य पूर्ण स्वतंत्रता के साथ अपने मन में विचारों की उत्पत्ति नहीं कर सकता। चूँकि हम सभी का जीवन कर्म और प्रारब्ध का संगम है। इसी कारण हमारे मन में कर्म करने हेतु विचारों की उत्पत्ति या तो पूर्व से तय प्रारब्ध के कारण होती है अथवा किसी वस्तु, स्थिति, परिस्थिति, इच्छाओं और आवश्यकताओं से प्रभावित होकर हमारे मन में विचारों का जन्म होता है।

मनुष्य के विचार ही उसका स्वभाव तय करते हैं, साथ ही मनुष्य के अंदर दृढ़ता, संशय एवं भय का वातावरण उत्पन्न करने के लिए भी मनुष्य के विचार ही जिम्मेदार होते हैं। इसलिए कहा गया है कि यदि मनुष्य की विचार शक्ति दृढ़ संकल्पित हो तो वह किसी भी प्रकार की इच्छा की पूर्ति करने में स्वयं सक्षम है। संशययुक्त विचार मनुष्य में भय उत्पन्न कर उसको लक्ष्य से भटकातें है।

मनुष्य की भ्रमित अर्थात् संशययुक्त विचार शक्ति उसको लक्ष्य से भटकाती है क्योंकि संशयपूर्ण विचार मनुष्य के अंदर भय और नकारात्मक वातावरण उत्पन्न करते हैं। इस बारे में भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन को उपदेश दिया है:-
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोअस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।

अर्थात् अज्ञान और संशय से ग्रसित व्यक्तित्व विनाश को उपलब्ध हो जाता है। भगवतप्रेम रहित और संशय से भरा पुरूष न तो इस लोक में सुख पाता है और न ही परलोक में। यहाँ संशय का तल मन तथा भगवतप्रेम का तल आत्मा है, यदि व्यक्ति के अंदर भगवतप्रेम हो तो उसके विचारों में संशय का कोई स्थान नहीं होता है।

मनुष्य के मन में जो भी विचार उत्पन्न होता है उसे कर्म में परिणित होने से पूर्व सर्वप्रथम आत्मा की पवित्र विचारशाला में बुद्धि रूपी प्रशासक और मार्गदर्शक के समक्ष उपस्थित होना होता है, यदि विचार पवित्र एवं उत्तम है तो बुद्धि मनुष्य को उक्त कार्य को करने के लिए उचित मार्ग प्रशस्त कर कर्म करने हेतु उत्साहित करती है। तत्पश्चात् यदि वह विचार दृढ़ संकल्पित होता है तो कर्म में परिणित हो जाता है। परन्तु यदि विचारों में दृढ़ता नहीं होती है अथवा बुद्धि के समक्ष विचार प्रस्तुत करते समय मन में कोई संशय होता है तो बुद्धि द्वारा सुझाये गये मार्ग में भी उसे भय और संशय ही प्रत्यक्ष होता है, ऐसे विचार कर्म में परिणित होने के स्थान पर अवचेतन मन में चले जाते है जो मनुष्य को बार-बार सशंकित करते रहते हैं।

परन्तु यदि पूर्व जन्म जन्मान्तर से चित्त में संचित प्रारब्ध अथवा वर्तमान के आसक्तिपूर्ण इच्छा से उत्पन्न होने के कारण विचार अपवित्र अथवा अनुचित है तो आत्मा की विचारशाला में बुद्धि आगे का मार्ग बताने के बजाय बार-बार उन विचारों को कर्म में परिणित होने से रोकती है और यह इंगित करती है कि इससे आपके संस्कार प्रदूषित होंगे तथा प्रदूषित संस्कारों से किये गये कर्म का परिणाम भी पीड़ादायक होंगे।

इन स्थितियों में यदि चित्त में जन्म जन्मांतर से संचित संस्कार नकारात्मक अथवा प्रदूषित हैं तो मनुष्य का चित्त उसके मन पर हाबी होकर उसे नकारात्मक एवं प्रदूषित संस्कार से प्रेरित होकर कर्म करने का रास्ता बताता है, फलतः मनुष्य का मन अपनी बुद्धि द्वारा दी गयी पवित्र सलाह को ठुकराते हुए चित्त की सलाह मानकर अपने कर्मो को अंजाम देता है और जब मन इस प्रक्रिया से बार-बार गुजरता है अर्थात् बार-बार पवित्र आत्मा की विचारशाला में बुद्धि की सलाह को ठुकराता है तो उसका वर्तमान आचरण और संस्कार भी नकारात्मक और प्रदूषित हो जाता है। इसीलिए कहा गया है कि कर्म करने से पहले कई बार सोचें, विचारें और अपने कर्मो में पवित्र आत्मा एवं बुद्धि की बातों को आत्मसात करें जिससे आपके संस्कार और इन संस्कारों से बनने वाले प्रारब्ध भी सकारात्मक एवं उन्नतिपूर्ण होगें।

वेदों में कहा गया है ‘‘अहं ब्रह्मास्मि’’ अर्थात् जीव और ईश्वर में कोई भेद नहीं होता है। देव, दानव एवं मानव कहीं कोई भेद नहीं है बल्कि मनुष्य के अच्छे सस्कारों से परिपूर्ण दृढ़ संकल्पित विचार शक्ति उसे इसकी श्रेणी प्रदत्त करती है। जो मनुष्य निःस्वार्थ भावना से, अथक व अनवरत जनकल्याण में सेवारत रहते हैं, वे मनुष्य ही देव की श्रेणी में गिने जाते है। मनुष्य योनि में ही जन्मित मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम, महान ज्ञानी, धर्म एवं प्रेम के प्रतीक श्री कृष्ण, महात्मा बुद्ध जैसे कई महापुरूषों को भगवान का दर्जा एवं मान्यता प्राप्त है।

इसी प्रकार जो मनुष्य अपने विचारों में भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर गृहस्थ जीवन यापन करता है वह मानव की श्रेणी में गिना जाता है। परन्तु इसके विपरीत जो मनुष्य अपने जीवन का हर कर्म केवल दूषित मानसिकता से अपनी आसक्तिपूर्ण इच्छाओं- आंकाक्षाओं की पूर्ति के लिए करता है, वह मनुष्य योनि में होते हुए भी दानव की श्रेणी में आता है।

इस विचार शक्ति के विषय को हम महाभारत काल में वीर अर्जुन के कर्मो से ठीक से समझ सकते है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी थे परन्तु स्वयं भगवान का साथ और सान्निध्य होने के बावजूद भी जिस समय अर्जुन ने महाभारत के युद्ध के लिए सज्ज होकर रणभूमि में प्रवेश किया तो उनके मन में अपनों का विनाश तथा प्रकृति के सृजन और विनाश आदि विभिन्न विषयों पर विचार उत्पन्न होने लगे। जिसके परिणामस्वरूप वह अपने कर्म हेतु अपने विचारों को संकल्पित नहीं कर पाये और उनके मन मेें आंशका एवं भय का जन्म हुआ, तत्समय भगवान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को मनुष्य के जन्म और कर्म के विषय में गीता का उपदेश दिया।

जिसके उपरान्त रणभूमि में युद्ध रूपी कर्म के लिए अर्जुन के मन में विचार दृढ़ संकल्पित हुए और अंततः उन्होंने महाभारत युद्ध में पूर्ण क्षमता के साथ अपने कौशल का प्रदर्शन किया और जीत भी हासिल की। महान् तपस्वी एवं ज्ञानी ऋषि-मुनियों द्वारा जिस प्रकार वेद-पुराणों की रचना की गयी वह उनकी दृढ़ संकल्पित दिव्यतापूर्ण विचार शक्ति का ही प्रत्यक्षीकरण है। आज के युग में भी विश्व के अनेक वैज्ञानिकों ने जिस प्रकार असंभव प्रतीत होने वाले बड़े-बड़े आविष्कार किये वो उनकी दृढ़ संकल्पित विचार शक्ति का ही द्योतक है। अतएव हम सभी मनुष्यों को मन में उत्पन्न होने वाले विचारों में सदैव पवित्र भाव रखकर अपनी आत्मा की आवाज के आधार पर कर्म करने को वरीयता देना चाहिए।

एस.वी.सिंह प्रहरी