राष्ट्रीय सहारा अखबार का बंद होना, एक मॉडल की विफलता

कोई उम्मीद बर नहीं आती/कोई सूरत नज़र नहीं आती।।। सहारा की बंदी की घटना में चचा गालिब का यह शेर न जाने क्यों लगता है कि फिट बैठता है। खबर है कि सहारा मीडिया समूह के सभी प्रकाशन अगले आदेश तक बंद कर दिए गए हैं। यह भारतीय मीडिया के इतिहास की उन घटनाओं में शामिल है, जिन्हें केवल “आर्थिक संकट” कहकर टाल देना सच से भागना होगा। यह दरअसल उस मॉडल की विफलता की कहानी है, जिसे बड़ी शिद्दत से खड़ा किया गया था। रिच कंटेंट पढ़ने को मिलता था। यहां के लोग बताते हैं कि सहारा के मीडिया संस्थान शुरू से ही लाभ-हानि के सामान्य नियमों पर नहीं चले।

0
100

कोई उम्मीद बर नहीं आती/कोई सूरत नज़र नहीं आती।।। सहारा की बंदी की घटना में चचा गालिब का यह शेर न जाने क्यों लगता है कि फिट बैठता है। खबर है कि सहारा मीडिया समूह के सभी प्रकाशन अगले आदेश तक बंद कर दिए गए हैं। यह भारतीय मीडिया के इतिहास की उन घटनाओं में शामिल है, जिन्हें केवल “आर्थिक संकट” कहकर टाल देना सच से भागना होगा। यह दरअसल उस मॉडल की विफलता की कहानी है, जिसे बड़ी शिद्दत से खड़ा किया गया था। रिच कंटेंट पढ़ने को मिलता था। यहां के लोग बताते हैं कि सहारा के मीडिया संस्थान शुरू से ही लाभ-हानि के सामान्य नियमों पर नहीं चले।

अख़बार और चैनल समूह की अन्य कंपनियों से मिलने वाली पूंजी पर निर्भर थे। यही कमजोर कड़ी थी। जब तक अन्य स्रोतों से पैसा आता रहा, तब तक संपादकीय विस्तार भी धड़ल्ले से चलता रहा। जैसे ही पूंजी की धारा रुकी, वैसे ही पत्रकारिता का ढांचा चरमराने लगा। सहारा के डूबते जहाज से सबसे पहले वे चूहे भागने लगे जिन्होंने ऐश की जिन्दगी यहां रहते हुए काटी। यह स्थिति बताती है कि सहारा में मीडिया एक स्वतंत्र उद्योग नहीं, बल्कि एक सहायक इकाई सी थी।

सेबी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश सहारा समूह के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुए। हजारों करोड़ रुपये निवेशकों को लौटाने की बाध्यता ने समूह की नकदी को जकड़ लिया। नतीजतन सबसे पहले वही इकाइयाँ प्रभावित हुईं, जो सीधे मुनाफा नहीं दे रही थीं। यहाँ सवाल उठता है कि क्या मीडिया को संकट के समय सबसे पहले कुर्बान किया जाना चाहिए था? इसे बचाने की कोई दीर्घकालिक योजना बनाई जा सकती थी। पर किसे परवाह। सहाराश्री के दुर्दिन के पीछे वही लोग थे जो उनके कुशल प्रबंधन कौशल से संचालित इस हाहाहूती जहाज में एक्सक्यूटिव क्लासिकी आराम गद्दी पर सवार थे जिसमें पहुड़ा भी जा सकता था, तब तक जब तक स्टीयरिंग सहाराश्री के पास था।

और हां यह नेपो-किड्स के वायरस कभी शिकार हुआ। सहारा प्रकाशन में संपादकीय स्वतंत्रता और प्रबंधन के रिश्ते हमेशा सम्पादकीय मानक के अनुसार नहीं रहे। कह सकते हैं कि सहज नहीं रहे। प्रबंधन सदैव ही भारी पड़ता रहा। इस समूह में माधवकांत मिश्र, विभांशु दिव्याल, सुनील दुबे, उपेंद्र राय जैसे कई बड़े नाम सम्पादकीय से तो अशोक ओहरी, दिनेश चंद्र श्रीवास्तव जैसे बड़े नाम प्रबंधन से भी जुड़े रहे।

उन दिनों देश में चिट फंडिया कम्पनियों का मीडिया तंत्र पत्रकारिता की दिशा और दशा तय करने की कोशिश में था और फलफूल रहा था। बड़े प्रोफेशनल पत्रकार वहां नौकरी से बचते रहे। हालांकि सहारा में नामचीन पत्रकार व प्रबंधक जुड़े भी रहे। सहारा में मीडिया हाउस संचालन के लिए संसाधनों का समुचित प्रदर्शन और रणनीति का अभाव भी महसूस किया गया।

फलस्वरूप पत्रकारिता की ऊर्जा संरचनात्मक मजबूती में नहीं बदल सकी। जिस दौर में भारतीय मीडिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, उस समय सहारा प्रिंट और पारंपरिक टीवी पर ही टिका रहा। डिजिटल को गंभीर व्यवसायिक विकल्प न मानना, विज्ञापन बाजार के बदलते स्वरूप को न समझ पाने की भूल भी बंदी की वजह बनी। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान उन सैकड़ों पत्रकारों और कर्मचारियों का हुआ, जिनकी मेहनत पर यह संस्थान खड़ा था। वेतन न मिलना, भविष्य की अनिश्चितता और संस्थागत चुप्पी ने मीडिया उद्योग के नैतिक पक्ष पर भी सवाल खड़े किए।

सहारा प्रकाशन समूह का बंद होना यह स्पष्ट करता है कि पत्रकारिता को कारपोरेट चमक से नहीं, पारदर्शी आर्थिक मॉडल, उत्तरदायी प्रबंधन और डिजिटल यथार्थ के साथ जोड़कर ही बचाया जा सकता था। अख़बार बंद होने से पहले ही उसका आत्मविश्वास और विश्वसनीयता बंद हो जाती है, ऐसा ही कुछ सहारा मीडिया समूह के साथ भी हुआ।

महेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार