संजय दत्त भी गये गन्ने वाली गली में पापा की कोठरी देखने

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इलेक्शन का माहौल था। 2009 लोक सभा चुनाव के लिए संजय दत्त को सपा में शामिल कर टिकट दिया गया तो उन्हें सबसे ज्यादा इस बात की उत्कंठा थी कि वह देखना चाहते थे कि पापा अमीनाबाद में किस छोटी सी कोठरी में रहते थे। अपनी किशोरावस्था में अपनी बुआ, चाचा आैर दादीजी के साथ। संजय को देखने मानो पूरा लखनऊ उमड़ पड़ा था। सब जगह लाल टोपियों में सपा कार्यकर्ता संजय की एक झलक पाने को बेकरार थे।

अमीनाबाद पूरा चोक हो गया था। सब जगह सिर्फ संजय की जय जयकार हो रही थी। वह उनके एक झलक पाने को लोग फूल मालाएं लेकर देर तक इंतजार करते रहे लेकिन सुबह के निकले संजय देर रात तक नहीं पहुंच पाये थे। जब वो समय से काफी लेट पहंंुचे तो काफी लोग मायूस होकर जा चुके थे। गन्ने वाली गली में जीर्ण शीर्ण मकान नंबर 102 को उन्होंने देखा। संजय दत्त नम्बर 102 की मकान मालकिन के बेटे कैप्टन सिकंदर अब्बास रिजवी के जॉपलिंग रोड स्थित बंगले पर मेहमान थे। वो अपनी पत्नी मान्यता के साथ पहंुचे तो उनको फूलों से नहला दिया गया। उनका खैरमकदम इस तरह किया गया जैसा बेटा अपनी बहू के साथ पहली बार घर आता है।

एक प्रेस कांफ्रेस में उन्होंने बताया कि जनाब सैयद मुजफ्फर हसन जो उस समय पंजाब सेना में थे, मेरे पिताजी को लखनऊ लेकर आये थे। मेरी दिली तमन्ना थी कि मैं अपने पापा दादीजी, बुआ व चाचाजी का वह मकान देखंू जहां मेरे पिताजी के साथ चार साल बिताए थे। 1949 से 1953 तक मेरे पिता आल इंडिया रेडियो लखनऊ में एंकर रहे थे। फिर रेडियो सिलोन में उनकी जॉब लग गयी आैर वो बम्बई चले गये। बताते चलें कि बाद में संजय दत्त के चुनाव लड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी।…

संजय की नशे की लत से छुटकारा : संजय दत्त दस साल की उम्र में पिताजी की फेंकी अधजली सिगरेट उठा कर पीने लगे थे। उनके बहकते कदमों की आहट जब माता पिता तक आने लगी तो बच्चा बिगड़ न जाए उन्हें बोर्डिंग स्कू ल में डाल दिया गया था। जब बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे तो उनके दोस्तों ने उन्हें ड्रग्स का स्वाद चखा दिया था। संजय अपनी मां को बहुत ही चाहते थे। मां की जानलेवा बीमारी ने उन्हें अंदर तक तोड़कर रख दिया था। मां से हमेशा के लिए बिछड़ने के अंदेशे ने उन्हें ड्रग्स की अंधेरी दुनिया में ढकेल दिया। मां के जाने के बाद वो एक दिन पापा सुनील दत्त के सामने आये आैर बोले कि मैं इस नरक से छुटकारा चाहता हंू। उन्हें अमेरिका के एक रिहैब सेंटर ले जाया गया जहां उनका लम्बा इलाज चला। वो ठीक होकर भारत लौटे। यहां प्रोड््यूसर उनके लौटना का इंतजार कर रहे थे। वो एक से एक बढ़कर कामयाब फिल्में कर सफलता के झंडे गाड़ते चले गये।…

एक घटना ने दत्त साहब की सोच को बदल, राजनीति की तरफ धकेल दिया : 31 अक्टूबर 1984 को जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गयी तो उस दिन दत्त साहब लंदन में थे। खबर ने उनको हिलाकर रख दिया। वो उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए पहली ही फ्लाइट ने दिल्ली के लिए चल दिये। रास्ते में उन्हें कुछ सालों पहले अपने परिवार से साथ श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ बिताये पल याद आने लगे। दिल्ली आये तो सड़कों पर खूनी मंजर व जगह जगह आगजनी को देखकर उनकी रूह कांप गयी। टैक्सी वाले से वापस एयरपोर्ट चलने को कहा। वो वापस बम्बई आ गये। एक दिन राजीव गांधी को फोन उनके पास आया। वो चाहते थे कि बम्बई के उत्तर पश्चिम से लोक सभा का इलेक्शन लड़ें। दत्त साहब भी चाहते थे कि वो जनता की सेवा का यह अवसर जो उन्हें मिलने जा रहा है उसे न खोया जाए। वो इससे पहले 1982 में बम्बई के शेरिफ चुने जा चुके थे। दत्त साहब लगातार पांच बार इसी सीट से एमपी रहे। बाद में इसी सीट से उनकी सबसे छोटी बेटी प्रिया दत्त चुनाव लड़ती हैं।

नर्गिस दत्त की कैसर से जंग से पराजय : दत्त साहब की जिन्दगी में नर्गिस दत्त के आ जाने के बाद काफी बदलाव आ गया था। वो टॉप के हीरो तो थे ही अब उनका बेटा संजय भी ‘रॉकी” फिल्म से हीरो बनने जा रहा था। बड़ी बेटी नम्रता की शादी उनके मित्र राजेन्द्र कुमार के बेटे कुमार गौरव से तय थी। (जो बाद में 9 दिसम्बर 1984 को सम्पन्न हुई।) 1980 में नर्गिस जी को राज्यसभा का सदस्य चुना गया। उन्हें अग्यनाश्य का कैंसर डिटेक्ट हुआ। उन्हें इलाज के लिए न्यूयार्क ले जाया गया। वे वहां ग्यारह महीने तक पांच सर्जरी व एक महीना कोमा में रहकर वापस इंडिया आयीं तो उन्होंने शिकायत करते हुए दत्त साहब से कहा कि आप मुझे न्यूयार्क क्यों ले गये। क्या भारत में सभी को इतना महंगा इलाज मिलता है? मुझे भी सभी की तरह यहीं रखना था। क्या अब तुम इन गरीब बेसहारा के लिए ऐसा ही इलाज मुहैया कराओगे? दत्त साहब ने नर्गिस का हाथ पकड़कर कर कहा,’बस ये समझो आज ही से काम शुरू हो गया।”

नर्गिस दत्त जी ने एक आैर वादा लिया कि चाहे व्हील चेयर या स्ट्रेचर पर ले जाओ मुझे संजू की फिल्म का प्रीमियर देखना है। सुनील दत्त ने तत्काल एक 7 मई के लिए एक एम्बुलेंस बुक की। लेकिन 3 मई 1981 को उन्होंने सुनील दत्त की बाहों में आखिरी सांस ली। 7 मई को तय समय पर ‘रॉकी” फिल्म का प्रीमियर हुआ। बाप बेटे के बीच एक सीट नर्गिस दत्त जी के लिए खाली रखी गयी।.. उनसे किये वायदे के अनुसार दत्त साहब ने नर्गिस दत्त मेमोरियल कैंसर फाउंडेशन की स्थापना की। एक कैंसर अस्पताल का निर्माण किया गया।

दुनिया भर में नर्गिस जी के चाहने वालों ने तीन मिलियन डालर का चंदा दिया जिससे देश के 18-20 अस्पतालों में कैसर यूनिट लगायी गयीं। उनके नाम से नेशनल इंटीग्रेशन पर बनने वाली भातरीय फिल्म के लिए नर्गिस दत्त फिल्म अवार्ड भी दिया जाने लगा।… दत्त साहब की जिंदगी से यह सबक लिया जा सकता है कि अगर आपके अंदर इच्छा शक्ति व कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, कितने भी तूफान आयें आप मुस्कुाते हुए बाहर आ जाएंगे। जेंटेलमैन शब्द शायद उन्हें देखकर ही बना होगा। अपने हसीन महबूब के जाते ही सुनील दत्त जी अब पहले भी ज्यादा कमजोर आैर बूढ़े दिखने लगे थे।.. 25 मई 2005 का मनहूस दिन इस अजीम शख्सीयत को हमसे छीन ले गया।
एक शेर वो हमेशा कहते थे-
हर रहगुजर पर शमा जलाना है मेरा काम
तेवर हैं क्या हवा के,  ये मैं देखता नहीं…

प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव