योगी जी आखिर कहां से लाएंगे बिजली, जब उत्पादन ही कम हो

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प्रदेश को और झेलनी पड़ेगी बिजली की कमी…. उत्तर प्रदेश पिछले कई सालों से बिजली उत्पादन क्षमता का विस्तार करने में फिसड्डी साबित होता रहा है। योजना तैयार करने और फिर लक्ष्य का मीडियामंडन होने तक जो उत्साह छलकता है वह परियोजना क्रियान्वयन के पहले ही पंक्चर टायर की तरह फुस्स हो जाता है। यह सौ प्रतिशत सही बयान कर रहे हैं, इसमें मिलावट‌ नहीं है। और इसीलिए देश‌ का सबसे अहम अपना प्रदेश बिजली के मामले में अभी तक अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया।

आकाश से बरसते अंगारों की जानलेवा आग से बचने का अकेला साधन बिजली है और उसके लिए भी प्रदेशवासियों की दशा ‘जल बिन मछली’ जैसी हो गई है। वह तो अच्छा हुआ कि एनर्जी एक्सचेंज बना दिए गए जिनसे बिजली की खरीद फरोख्त करके इतनी भी सप्लाई हो जाती है अन्यथा तिलझ-तिलझ कर गर्मी गुजारनी पड़ती। देश मे बिजली की खरीद फरोख्त के लिए कंपनियों के तौर पर पहले दो ऊर्जा एक्सचेंज स्थापित किए गए थे इंडियन एनर्जी एक्सचेंज और पाॅवर एक्सचेंज ऑफ इंडिया।

पिछले साल जुलाई में तीसरा -हिंदुस्तान पाॅवर एक्सचेंज सक्रिय हो गया। ये तीनों एक्सचेंज सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेग्युलेटरी कमीशन के अंतर्गत काम करते हैं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) से जुटाई गई जानकारी से सामने आया कि उत्तर प्रदेश में बिजली की अधिकतम मांग शीर्ष समय पर 22 हजार 480-22 हजार 490 मेगावाट रहती है। कोशिशों के बावजूद 427 मेगावाट की कमी का दंश प्रदेश के उपभोक्ता झेलते हैं।

जाहिर है विद्युत प्रशासन यहां -वहां कहीं न कहीं कटौती करेगा। इतनी मांग की तुलना में औसत उत्पादन 11 हजार 788 मेगावाट हो पाता है। लिखत-पढ़त में प्रदेश के बिजली संयंत्रों की कुल स्थापित क्षमता 19 हजार 298 मेगावाट की है (थर्मल-14,884 मेगावाट, हाइडिल- 1,297 मेगावाट, सोलर-1,731 मेगावाट, को-जनरेशन- 1,360मेगावाट और बायोमास- 26मेगावाट)। गौर करिए, संयंत्रों में स्थापित क्षमता का सिर्फ 61 प्रतिशत इस्तेमाल हो पाता है। यह कहानी तो उत्पादन की है।

नई क्षमता की स्थापना पर आइए। अधिक पीछे झांकने की जरूरत नहीं है। मिसाल के तौर पर बीते दो सालों को लेते हैं। वर्ष 2020-21 के दौरान प्रदेश में 11हजार 197 मेगावाट की नई क्षमता उत्पन्न करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था लेकिन सिर्फ 5 हजार 436 मेगावाट की क्षमता स्थापित की जा सकी अर्थात लक्ष्य की मात्र 49 प्रतिशत प्राप्ति। 2021-22 में तो और भी दयनीय स्थिति रही, इसमें 11 हजार 478 मेगावाट क्षमता का लक्ष्य तय किया गया था और उपलब्धि 4 हजार 878 मेगावाट पर सिमट गई यानी लक्ष्य का 42 प्रतिशत हासिल किया जा सका । विभागीय सूत्रों का कहना है कि सबसे बड़ा कारण वित्तीय संसाधनों की अपर्याप्तता, और दूसरी वजह जिम्मेदारों का अन्य कार्यों पर फोकस करना।

प्रणतेश बाजपेयी