तो संघ का डैमेज कंट्रोल था बटुक सम्मान !

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक द्वारा अपने आवास पर बटुकों का सम्मान-पूजन और भोजन कराए जाने के मामले में नई कहानी सामने आई है। पता चला है कि उन्होंने ऐसा संघ प्रमुख मोहन भागवत के इशारे पर किया है। खबर है कि इसके लिए पहले मुख्यमंत्री योगी से कहा गया था कि वे शंकराचार्य मुद्दे का पटाक्षेप करें पर योगी इसके लिए तैयार नहीं हुए। फिर इसके बाद डिप्टी सीएम बृजेश पाठक को निर्देश दिया गया कि वे बटुकों को बुलाकर उनका सम्मान करें। संघ मानता है कि इस विवाद से भाजपा को नुकसान सकता है।

* सीएम योगी के इनकार के बाद डिप्टी सीएम बृजेश पाठक को सौंपी गई कमान
* दूसरे डिप्टी केशव मौर्य पहले ही शंकराचार्य को भगवान कह मांग चुके हैं माफी

प्रयागराज संगम मेले में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के अपमान के मामले में अब जो जानकारी आ रही है उसका निचोड़ ये है कि संघ चाहता है कि बहुत जल्द इस विवाद का अंत किया जाए नहीं तो हिंदू मतों में बिखराव के चलते 2027 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान हो सकता है। संघ मानता है कि इस पर हिंदू समाज दो वर्गों में बंट गया है। इस विवाद के बाद सोशल मीडिया में बहुत सारी बातें भाजपा के खिलाफ कही गई थीं। और शंकराचार्य के सम्मान को हिंदुओं के अपमान से जोड़ा गया। यहां तक कि मुस्लिम विद्वानों ने भी शंकराचार्य के अपमान को गलत बताया था। सपा ने तो शंकराचार्य के मुद्दे को लेकर योगी सरकार को घेर ही लिया है। भाजपा ने भी सपा को यह कहकर कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है कि उनकी सरकार में भी शंकराचार्य पर लाठीचार्ज हुआ था। इसके जवाब में सपा ये कहकर बचती दिखाई दी कि है कि तब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य की पदवी पर नहीं थे, फिर भी हमने माफी मांग ली थी।

इस विवाद के आने के बाद प्डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने शंकराचार्य से माफी मांगी थी, और कहा था कि मैं शंकराचार्य भगवान से निवेदन करता हूं कि वे संगम स्नान करके इस मामले का पटाक्षेप करें। उनके अपमान के लिए दोषियों के खिलाफ जांच करके कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने माघ मेले में जाकर शंकराचार्य से मिलने की बात भी कही थी, पर कतिपय कारणों वे नहीं गए। तब शंकराचार्य ने इसे योगी आदित्यनाथ से जोड़ दिया और कहा था कि केशव प्रसाद मौर्य को मुझसे मिलने के लिए मना कर दिया गया।

ये विवाद तब बढ़ गया जब शंकराचार्य ने अपने अपमान को लेकर माघ मेला में अपने शिविर के बाहर धरना शुरू कर माफी की मांग कर दी। इसके बाद मेला प्रशासन ने उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मान लिया। फिर शंकराचार्य और नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि सरकार कौन होती है, शंकराचार्य से प्रमाण मांगने वाली। बाद में शंकराचार्य बिना स्नान किए ही धरना समाप्त कर काशी चले गए थे। कुछ दिन बाद काशी में ही गंगा आगमन करके सांकेतिक स्नान किया और ये कहकर विवाद खत्म किया कि चूंकि शंकराचार्य के स्नान के बिना माघ मेला पूर्ण नहीं हो सकता, इसलिए जन सामान्य के लिए मैं आचमन कर इस विवाद का अंत कर रहा हूं।

बाद में शंकराचार्य ने कहा कि मैने तो शंकराचार्य होने का प्रमाण दे दिया पर अब योगी आदित्यनाथ अपने हिंदू होने का प्रमाण दें। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश से पूरे देश का 40% गोमांस निर्यात होता है और गोबध होता है। ऐसे में पहले योगी गोवंश का वध रोकें, गोमांस का निर्यात रोकें, तब मैं उनको सच्चा हिंदू मानूंगा। यदि वे ऐसा नहीं कर पाए तो 10 से 12 मार्च तक लखनऊ में संतों का सम्मेलन आयोजित कर इसका निर्णय किया जाएगा कि योगी असली हिंदू हैं, या कालनेमि। पर बयानबाजी रुकी नहीं। योगी ने विधानसभा में कह दिया कि किसी पीठ पर बैठे किसी भी व्यक्ति को अव्यवस्था फैलाने की मंजूरी नहीं दी जा सकती है।

बीते 17-18 फरवरी को लखनऊ में संघ प्रमुख मोहन भागवत के दौरे में भी इस पर चर्चा उठी। संघ प्रमुख ने लगभग डेढ़ घंटे तक योगी आदित्यनाथ से अकेले में मुलाकात की। सूत्र बताते हैं कि यहीं पर उनसे कहा गया कि वे इस विवाद का खत्म करें, पर सीएम इसके लिए तैयार नहीं हुए। उसके बाद संघ प्रमुख ने केशव मौर्य और बृजेश पाठक से मुलाकातें कीं। चूंकि केशव मौर्य पहले ही शंकराचार्य के पक्ष में बयान दे चुके थे, इसीलिए डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक को चुना गया। असल में इस विवाद को ब्राह्मण बनाम ठाकुर का भी रूप देने की कोशिश हुई थी, इसलिए रणनीति के तहत ब्राह्मण चेहरा डिप्टी सीएम बृजेश पाठक को डैमेज कंट्रोल के लिए कहा गया। फिर संघ के निर्देश पर उन्होंने अपने आवास पर 101 बटुकों को बुलाकर उनका सम्मान किया। उन्होंने कहा कि बटुकों की शिखा खींचना महापाप है। इसे किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता।

इस कवायद से बृजेश पाठक को फायदा यह हुआ कि उनकी ब्राह्मणों के बीच अच्छी छवि बनेगी और एक ब्राह्मण नेता की पहचान भी बनेगी। हालांकि प्रदेश में ब्राह्मणों की नाराजगी से चिंतित संघ परिवार अभी भी इसका कोई और सटीक काट खोजने में लगा है। क्योंकि अभी नैरेटिव तो यही बना है कि भाजपा से ब्राह्मण नाराज हैं, और वह इस बार विकल्प की तलाश में हैं। इसको लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने ब्राह्मणों पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं। अब तो शंकराचार्य की नाराजगी और बढ़ गई है क्योंकि उनके खिलाफ प्रयागराज की एक कोर्ट ने पाक्सो एक्ट ने मुकदमा दर्ज करने का आदेश दे दिया है, और आरोप योगी सरकार पर लग रहे हैं। यह मामला भी आग में घी डालने जैसा होगा।

अभयानंद शुक्ल
कार्यकारी सम्पादक